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Tuesday, August 7, 2012

उग आई सुधियां





वसुधा-तल मेंहंदिया गया
ज्‍यों मेहंदी तुम्‍हारे हाथ की ।

दमकें दामिनी जैसे तुम्‍हारे
श्‍यामल कुन्‍तल में
गुंथी स्‍वर्ण-डोर,
तोड़ अधरों के अनुबन्‍ध
बिखर गई रिमझिम-सी
तुम्‍हारी हंसी चहुं ओर।

दूर्वा सी उग आई सुधियां
प्रथम-प्रणय सौगात की।

पुरवा की ताल पर
नाचे फुहारें, नाचती ज्‍यों
तुम झूम-झूम घूमर,
टूट-टूट नभ से
छुमकती आंगन में बूंदें
ज्‍यों पांवों के नूपुर।

ऐसे में मदिरा भी क्‍या,
मादक है ऋतु बरसात की।
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6 comments:

  1. उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवार के चर्चा मंच पर ।।

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  2. बहुत ही सुंदर....

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  3. दूर्वा सी सुधियाँ ...
    मधुर सुकोमल हर्षित स्मृतियाँ !

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  4. सुंदर नवगीत।

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  5. वाह! बहुत सुंदर गीत...
    सादर।

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