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Friday, September 7, 2012

आदमी की अस्मिता


टूटे सपन की किर्चियां,
है ये शहर की बस्तियां।

बहरा, प्रदूषित शहर यह,
सुनता न उदास सिसकियां।

इश्तिहार-सा हर शख्‍स,
चेहरों पे हैं तल्खियां।

दिल मिलते नहीं यहां,
मिलती है सिर्फ हथेलियां।

हाथ में ले घूमते यहां-
लोग माचिस की तिलियां।

रेत की हथेली पे धरी -
दफ्तरी कागज की किश्तियां।

आदमी की अस्मिता है,
उधारी चाय की पर्चियां।
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