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Wednesday, July 25, 2012

बूंदों की बाँसुरी छेड़ों



घिर आएंगे नभ में बादल,
जो हठीली अलकें खोल दो ! 

प्राण दग्‍ध कण्‍ठ में आ अटके,
और तृषित मृग मरू में भटके,
जलाओ धन बीच फुलझडि़यां,
सहसा ही मतवाली झडि़यां !

आषाढ़ मेघ पुलक से बरसें,
नेह से तन-मन-प्राण परसें,
निखरे रूप और काजल का
जो नशीली पलकें खोल दो !
घिर आएंगे नभ में बादल,
जो हठीली अलकें खोल दो ! 

करो शीष वरद जलधर छांह,
गही शीतल पुरवा की बांह,
दीखे चहुँ ओर सावन हरा,
वरदानों से हो कलश भरा !

प्‍यार नहीं अब तुम यू बांधो,
और रवि-रश्मि-तीर साधो,
बूंदों की बाँसुरी छेड़ तुम,
नव-पुलक से रस-रंग घोल दो !
घिर आएंगे नभ में बादल,
जो हठीली अलकें खोल दो !

सहकर ताप बिलखी-बिसूरी,
मन की इच्‍छाएं-कर्पूरी,
नभ के बादल अपने-से लगे,
प्राणों में प्रणयति-गीत जगे !

गूँजा वन-उपवन पिक-स्‍वर से,
आलिंगन को चपला तरसे,
ओ, वरूणा ! अनुबन्‍ध जलीली
खोल अधर मदिर बोल दो !
घिर आएंगे नभ में बादल,
जो हठीली अलकें खोल दो !
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