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Saturday, September 1, 2012

अर्थ की यात्रा



रिश्‍ते भी जो किए हैं हमने तो दर्द से हंसते-हंसते।
गम मिले तो झटक दिए राह की धूल से चलते-चलते।

पंछी वो हैं हम न गिला मौसम से न मोह किसी शाख से,
फिजाओं से भी जो गुजरे हैं हम तो चहकते-चहकते।

भोलापन तो देखिए हमारा, देख के चांद पानी में,
खिलखिला दिया किए उस बचपन की तरह मचलते-मचलते।

नजर आता न फर्क गुबारे-राह और शमशान की राख में-
नहा के आऐ हम मस्‍त औलिया – से टहलते-टहलते।

ये सरोवर ये झरने व्‍यवहार नहीं करते अब मित्र-सा,
दरिया के किनारे भी रहते हम तिश्‍नगी सहते-सहते।

मुहाल दिले-मुराद यहां लोग कमनजर जो सताइश,
यार ! शहकार रचनाएं भी रह जाती है छपते-छपते ।

मन की हर गजल असमंज भरी है यहां पे ‘’यादवेन्‍द्र’’
अर्थ की यात्रा में उम्र तमाम हुई यों ही पढ़ते-पढ़ते।
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