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Sunday, August 5, 2012

सपनों को दे भाषा





तुम आओ तो 
दोनों सपनों को भाषा,
दें अर्थ नए-नए गीत को।

कंचनवर्णी देह-गन्‍ध को,
अपनढ़े पायल के छन्‍द को,
दें अर्थ नए-नए गीत को।

अरुणाए अधरों पर पनघट-
उमसती अनचाही प्‍यास को,
पहना दें स्‍वाति बुंदकियां हम-
चूंम लें झुकते आकाश को,
तुम आओ तो
लगे गाने अधर की पिपासा,
दें मधुर हास पर्ण-पीत को,
सावन हरा गर्द-गुबार को,
दें नव प्राण सूखी डाल को,
सावनी फूलों की रीत को।

हरियायें साध की फगुनियां,
पुलक उठे केसर पराग से,
मुखर हो गुन-गुन गुनगुनाए
बोझिल चुप्पियां अनुराग से,
तु आओ तो
गूंगी यह अभिलाषा,
चाह रही सौपान मीत को,
उन्‍माद भर सजल श्रृंगार को
औ’ कजली मेघ-मल्‍हार को,
कि चाहती व्‍याहना प्रीत को।
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