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Sunday, January 13, 2013

नेहर आंगन लगे बिराने




नई दुल्‍हनिया
खड़ी अटरिया
निरख नम-नयन काजल
लगी हिलहाने।
सुलगती धूप
अंचरा छुपा/बदरिया
शीतल झरी से
भिजो गई चुनरिया
माटी को
सौंधी/बांट रही
घर-घर पुरवा
जा बैठी
सिरहाने।
दादुर, मोर, पपीहा/ढाई आखर
प्रेम के रहे बांच
तन-मन-प्राणों में
ठंडी-ठंडी आंच
अंकुरित दूर्वा सी
नचते मोर-पंखों सी
कसमकस
लगी नस-नस पिराने।
सुनी सांवनी रातें
बिजुरिया खेले/आंच मिचोली
जबरन घुस चौबारे
फुहारे करें ठिठोली
नेहर-आंगन
सखी सहेलियां
अपने लगे
अब बिराने।
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