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Monday, May 7, 2012

पुन: मिलेंगे

1

रंगीली पुस्‍तकों के भार से कुछ डगमगाती,
बदली के झीने आंचल से छिपे चांद सी,
मेघों के आंसू से सज्जित दूर्वा सी,
धरती पर नई चांदनी सी,
स्‍वर भरती थी पथ पर चलते मान के उर तारों पर।

अंजाना पंथी तब एकाएक हृदय का गीत बन गया,
नयन जिसे स्‍वप्‍नों में खोजा करते थे,
वह पल भर पुतली में बस
मन का मीत बन गया।

आंखें में थे प्रश्‍न कि
अब तक कहां रहे तुम,
प्‍यार भरी प्रिय के लोचन
छलका कर पलकों की प्‍याली को,
बोले ''हम तो पास तुम्‍हारे ही थे
जैसे चांद सितारों से है नभ में पास।''

योंहीं यलती रही एक दो क्षण,
आंखों से अधरों से दो दिल की बातें,

किन्‍तु धडक कर बैठ गए दिल
और मधुरतम मौन युगल उर की सब बातें,
भौंपू के स्‍वर में डूबी,
तैरी लारी के रूकने में,
फिर चलने में बह-बह गई।

बस क्‍या आई,
एक बडी बेबसी आ गई,
बस क्‍या गई,
कि जैसे जीवन की बगिया से जाता मधुर बसंत।

आश्‍वासन दे गया,
मगर बस का पिछवाडा,
पुन: मिलेंगे.........।

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समर्पण

वात्‍सल्‍यमयी विनम्रता की मूर्ति उस जननी के नाम कोष से जन्‍म ले खेला धूलि में जिसके सुबह-शाम उन सन्‍दर्भों को जिनकी स्‍मृतियां खिल कर सुमन हुईं शब्‍दों की ये कुषुमांजलियां समर्पित समता को शत़-शत़ प्रणाम। 

-कवि

निवेदन

शीर्षकहीन ''अशीर्ष कविताएं'' से स्‍वत: ही जीवन की विद्रूपता स्‍पष्‍ट हो जाती है। जिन्‍दगी के कंकरीले-धरातल पर चलते-चलते जो छाले मुझे टीसते चले गए हैं, वे सभी इन रचनाओं में प्रतिबिम्बित हैं। 

ये मेरी मान-संतान न तो किसी वाद से जुडी है और न इनपर किसी वाद की छाप ही है। मुझे अपनों-परायों जिन्‍होंने भी जो भी दिया, वह मेरी चेतना नेअन्‍तस की मथनी में बिलो कर जैसा था वैसा नवनीत सा रख दिया है। 

आप अपनी-अपनी परख की आँच पर तपा कर धूत बनाने के पूर्ण हकदार हैं। 

--रघुनाथसिंह ''यादवेन्‍द्र''