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Saturday, July 28, 2012

तुम्‍हारी श्‍यामल अलकों ने...



जैसे तुम्‍हारी,
श्‍यामल अलकों ने,
तान दिया पाल, छत पर आकाश के।

झर रहे कि शब्‍द
बूंद-बूंद गीत के,
उभर रहे अर्थ
दूर्वा से प्रीत के,
शरमीली नत श्‍याम-
नील पलकों में,
झूल रहे प्रतिबिंब, आकुल प्‍यास के ।

फूल रही कि
माटी में साधनाएं,
नाचते मोरों-सी
ठुमकें कामनाएं,
जुड़ रहे सन्‍दर्भ
कि नभ से धरा के
ठहरते न पांव भीगी, वातास के ।

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