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Thursday, September 27, 2012

दूर टेरती बांसुरी


मंदिर के स्‍वर्ण कलश से
सरक जाती है जब धूप,
होठों पर मुखर हो आता बरबस तुम्‍हारा नाम।
यह गोधूलि, सांझ अकेली,
श्‍यामल सी छाया मैली
चहचहाते नीड़-नीड़ में,
लौटते पक्षी भीड़ में
द्वार पर रख जाते है गुमसुम-सी बुझी-बुझी शाम।
होठों पर मुखर हो आता है बरबस तुम्‍हारा नाम।।

दृग मूंद सोती पांखुरी
दूर टेरती बांसुरी
निशा नशीली साथ न तुम
भीतर-बाहर तम, आंखें नम
तुलसी-चौरे पर टेरे कि पूजा का दीप-ललाम।
होठों पर मुखर हो आता है बरबस तुम्‍हारा नाम।।
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