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Thursday, November 8, 2012

क्‍यों दूरियों का पुल




मन आज बहुत विकल, प्राण! सुन-सुन कल-कल।
पास इतने फिर भी, क्‍यों दूरियों का पुल ?
सुर्ख रुखसारों पे, खिले ये लाल कमल,
विहंसते कजरारे नटखट नयन चंचल।

झंकृत जल तरंग लख उन्‍नत श्रीफल,

चढ़ा नशा जाए न उतर रूप का जल। 

श्‍वासों का कपूर, प्रिये! उड़ रहा पल-पल, 
मुहूर्त प्‍यार का जाए न कहीं टल। 
फिर फिर झुमकाओं रूनझुन-रूनझुन पायल,
रहें या न रहें हम रहेगी प्रणय-ग़ज़ल।
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