Thursday, February 21, 2013
Tuesday, February 19, 2013
Monday, February 18, 2013
बसंत
मित्र !
अभिजात्य
रेशमी-शॉल ओढ़
कांधों पर
नागरीय-शकुनी का शव धरे
दु:शासनी मकढ़ी के जालों
दुर्योधनी द्वेष की गर्द में
आंकठ डूबे
अपने भीतर-बाहर के सेभी द्वार बंद कर
हरियल खेतों की मेड़ों पर
गेहूँ की बालियों
सरसों के पीले फूलों
महकाते धनिया
बौराई अमराइयों की
बासंती-गंध को
श्वासों में कैसे भर पाओगे ?
मित्र !
अपने को ''मैं'' से मुक्त करो
कोकिला के स्वर में स्वर मिलाओ
भंवरों के गुन्जन के संग-संग
मन को उन्मुक्त हो उड़ने दो
फिर बसंत को
अपने भीतर
खिलखिलाता पाओगे।
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Sunday, January 13, 2013
नेहर आंगन लगे बिराने
नई दुल्हनिया
खड़ी अटरिया
निरख नम-नयन काजल
लगी हिलहाने।
सुलगती धूप
अंचरा छुपा/बदरिया
शीतल झरी से
भिजो गई चुनरिया
माटी को
सौंधी/बांट रही
घर-घर पुरवा
जा बैठी
सिरहाने।
दादुर, मोर, पपीहा/ढाई आखर
प्रेम के रहे बांच
तन-मन-प्राणों में
ठंडी-ठंडी आंच
अंकुरित दूर्वा सी
नचते मोर-पंखों सी
कसमकस
लगी नस-नस पिराने।
सुनी सांवनी रातें
बिजुरिया खेले/आंच मिचोली
जबरन घुस चौबारे
फुहारे करें ठिठोली
नेहर-आंगन
सखी सहेलियां
अपने लगे
अब बिराने।
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