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Friday, October 19, 2012

दीप


रात भर दीप जलता रहा।
अंधेरे से लड़ता रहा।।
वृत्तियों के गहन तिमिर में,
मृत्तिका-प्रकाश पलता रहा।
चित्र लिखित निहारिकाओं की-
पंखुडि़यों से नभ सजता रहा।
कज़ली-निशा के अंक में,
प्रणय का पुंज खिलता रहा।
रूप यौवन के दर्पण में,
सौ-सौ बार संवरता रहा।
घर-द्वार दीपावलियों से-
जगमग-जगमग करता रहा।
ज्‍योति के सुमन झरते रहे
पुलक से मनुज पुलकता रहा।
आंधियां सर पटकती रही
भोर तक दीप जलता रहा।
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Thursday, October 18, 2012

ग़ज़ल


बदले में लोग क्‍या देते हैं?
आग को सिर्फ हवा देते हैं।
दोस्‍ती का दम भरते हैं जो,
बीच सफ़र में दग़ा देते हैं।
जलती है आज भी सीताएं,
लोग कैसी दुआ देते हैं?
खा के बीमार मर जाते हैं
हकीम कैसी दवा देते हैं?
आरती के दीप बन जले हम,
बुत किस जुर्म की सजा देते हैं?
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Wednesday, October 17, 2012

ग़ज़ल



वो इतने कमनज़र न होंगे।
जो गहरे समन्‍द होंगे।।
मजलूमों के खूं से रंगे
देखने ये मन्‍जर होंगे?
सह पाएंगे ना तूफान,
जो भी रेत के घर होंगे।
जिनका खूं पानी हो गया,
इतिहास में वो किधर होंगे? 
जिएं जो मुफलिसों के लिए, 
वो ही दिलों के सदर होंगे।

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Tuesday, October 16, 2012

सहमे हुए व़क्ष



वृक्ष
सहमे हुए हैं
कुल्‍हाडि़यों के डर से।
खुद
अपनी ही ज्‍वाला में
जल रहे हैं
पलाश,
बीमार है
पीलिया से
अमलतास,
शहतूती अहसास
चूक गए
गांव शहर से।
गीतों में
कहां अब वो
उल्‍हास,
फूलों के गांव
फागुन
बहुत है उदास,
पीडि़त है मानवता
हवाओं से
घुले जहर से।
उतर गए रंग
छूते ही
तितलियों के पांखों के,
पाला मारते ही सरसों
टूट गए
क्‍वांरे स्‍वप्‍न आंखों के,
आते-आते
लौट गईं खुशियां
गरीब के घर से।
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Monday, October 15, 2012

हलधर




वह आदमी
जो
हल कांधे पर धरे
बैलों की रास थामे
अक्षरों से अनभिज्ञ
अक्षरों से शब्‍दों के रिश्‍तों
और
उनकी ध्‍वनि से भी अनजान है
किन्‍त वह कभी कोसता नहीं
पृथ्‍वी, सूर्य, मिट्टी-जल, आकश को
इन्‍हें टुकड़ों में भी नहीं बांटता
वह तो
इन्‍हें जोड़ कर
संचित करता है
जीवन-शक्ति
अपने भीतर
शक्ति से
जन्‍म देता है परिश्रम को
और
श्रम-बिन्‍दुओं को बाता है
मिट्टी में
फिर हल की कलम से
लिखता है कविता।
जो अस्‍त्र बन
राष्‍ट्र की अस्मिता के लिए
संघर्षों से
जूझना सिखाती है,
कविता
वह जो फसल-सी
लहलहा कर
भूख से लड़ती है।

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Sunday, October 14, 2012

तीन क्षणिकाएं

समाजवाद.....

उनको मुटा गया सुख

आ गया

कुर्सियों का स्‍वाद,

इसलिए उन्‍होंने

अपनों में बांट लिया समाजवाद।

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चतुर बन्‍दे.....

बिना किस श्रम

खोले आश्रम

मांग-मांग कर चन्‍दे

बड़े हो गए

बापू के बन्‍दे।

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अभाव.....

चीलों से मंडराते लोग

मारते हैं छापे

गांव-गांव

रोटी की तलाश में

हर मुंडेर पर

करता है कौआ

कांव-कांव।

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Saturday, October 13, 2012

रेत का घर



तुतलाते सपने
मासूम आंखों से
आंसू बन ढुलक गए,
मोतिया-बिन्‍द बन उतर आए
जो भी था अपना
चुटकी भर सुख,
सब डूब गया धुंध में
तलाशते स्‍वयं को
थक गया, हार गया

मैं

नन्‍हें पांवों से

बुढि़याते पांवों की यात्रा तक

बनाते-बनाते रेत का घर।

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