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Wednesday, November 14, 2012

भीड़ का दस्‍तूर




छिलता है शरीर रोज भीड़ का दस्‍तूर है।

बिकता है ज़मीर रोज, भीड़ का दस्‍तूर।।

बिखरता रहा सूरज टूट के किरच-किरच हो,

चूभते रहे तीर रोज, भीड़ का दस्‍तूर है।

घर की तलाश में मिली यंत्रणा आँखों को,

चुकता रहा नीर रोज, भीड़ का दस्‍तूर है।

वृक्ष तो है कुल्‍हाडि़यों से सहमा-सहमा सा-

आता है समीर रोज, भीड़ का दस्‍तूर है।

दिन ढले शाम होती है कि आलपिनों की चुभन

टीसती है पीर रोज, भीड़ का दस्‍तूर है।

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4 comments:

  1. वाह ... बेहतरीन

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  2. आपकी पोस्ट आज चर्चा मंच पर है

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  3. बेहद भाव पूर्ण ...

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  4. बहुत उम्दा लाजवाब
    गहरे भाव पूर्ण यह गजल ने दिल जीत लिया है
    आदरणीय रघुनाथ सिंह जी हार्दिक बधाई

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