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Sunday, July 22, 2012

शरद्-निशा

शरद् निशा में, प्राण ! तुम्‍हारी मधुर याद आती है। 

उतर पड़ी भू पर नभ से, चांदी सी धुली चांदनी, 
झिलमिल-झिलमिल भर मांग सितारों से कितनी मनहर,
सौरभ मन्‍द पवन बह जाता, कह कर बात तुम्‍हारी, 
लाज-गुलाबी सपने हँस-हँस जाते कम्पित पलकों पर, 

दिशि-दिशि से उठती विरह गीत की स्‍वर लहरी,
मेरे कानों पर खोई-खोई सी मंडराती है। 
मृदु-स्‍वप्निल प्रणय-मिलन की सुधि आ जाती है।
शरद् निशा में, प्राण ! तुम्‍हारी मधुर याद आती है।

आया बसंत पर कोकिल कूक नहीं पाई, 
सूने-सूने जीवन पर रोते हैं तारे, 
टलती जाती क्‍यों घड़ि‍यां या मधुर मिलन की, 
तुम मिलो कि मेरा तन-मन प्राण पुकारे। 

रूप संवारे किस यौवन-दर्पण में उर की प्रीति तरुण, 
शशि की किरणों पर परछाई अकुलाती है, 
मन की व्‍याकुलता नयनों में घिर आती है, 
शरद् निशा में, प्राण ! तुम्‍हारी मधुर याद आती है।

1 comment:

  1. उत्कृष्ट प्रस्तुति सोमवार के चर्चा मंच पर ।।

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