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Saturday, August 4, 2012

बादलों के शामियाने




धरती पर बिछ गए हैं,
दूब के हरे गलीचे,
तन गए आकाश में, बादलों के शामियाने।

पांव में
मौसम के बूंदों की पायल बजती,
छांव में
प्रीत बावरी, कि पिव-पिव पुकारती।

तन-मन-प्राण हरियाये,
ये यादों के बागीचे,
धर गई पुरवाई इक गीला, छन्‍द सिरहाने।

गांव में
यहां डाल पर गदराये कच्‍चे आम,
नाँव में
अधरों की, आ बैठ जाता एक नाम।

क्षुधा-सांवरी यह भरे
कलश उरोजों पे सींचे,
आसाढ़ क्‍वांरे घन, छज्‍जों पर लगे उतराने।
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Friday, August 3, 2012

डूबे नयन में जब नयन




डूबे नयन में जब नयन ।

रस-प्‍लावित अरूण अधर पर,
कम्पित दो अधर जब धरे,
झुकीं समर्पण में पलकें
प्रश्‍वास प्रसून-सा झरे ।

गंधाये कुसुमित दो क्षण।
डूबे नयन में जब नयन ।।

कुन्‍तलों में घुमा कर-
नेहमय बजा मौन संगीत,
तिमिर गुहा-घाटियों में,
प्रसूता मधुर प्रणय-गीत।

चन्‍दन से महकें श्रम-कण ।
डूबे नयन में जब नयन ।।
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Thursday, August 2, 2012

एक गीत किसी नाम का

बैराता जब
बौर आम का,
होठों पर उग आता कोई,
एक गीत किसी के नाम का।

ओढ़ चुनरिया
बासंती धूप,
बतियाती पीली सरसों में
उभर आता है तुम्‍हारा रूप।

खेल-मेढ़ का
मुखर ग्राम का,
नाच-नाच फसलों की राधा,
गाती गीत अपने श्‍याम का।

काली कोयल
कुहू-कुहूकती,
मन की सूनी मुंडेर पर जब-
लगे दूर कहीं तुम टेरती।

रंग जाता तन,
आठ याम का,
फूलों के केसर-पराग से
गंधायित उदास मन शाम का।

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Wednesday, August 1, 2012

यह बदली



यह बदली
न जाने कहां पी आई पगली।

ठहरते न पांव कि शोर मचाए,
द्वार-खिड़कियों पे थाप लगाए,
यह बदली
झूम-झूम गाए कजली।

बरबस गहती मुझको बांह में,
औ’’ भीगे आंचल की छांह में,
यह बदली
जैसे कि तार बुनती हो तकली।

होठों तक आती मन की बातें,
दूब-सी उग आई सौगातें,
यह पगली
भेद मन के खोल गई बिजली।

यह बदली
न जाने कहां पी आई पगली।
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Tuesday, July 31, 2012

सूर्यमुखी हँसी

रूप का दीप जला
प्राण ! तुमने घर आंगन उजियार दिया।

आई नूपुर बांध पांव में,
ज्‍यों बिजली प्रतीक्षित गांव में,
जूड़े गूंथ उजले -
फूल कांस के, सुधियों ने श्रृंगार किया ।

घर आया ज्‍यों क्‍वार का धान,
ऐसी तुम्‍हारी मुस्‍कान,
दुहरा नयन- काजल,
आधी रात, दर्पण ने मनुहार दिया ।

उजलाई गहरी छायाएं,
टूटी ताड़ सी प्रतीक्षाएं,
सूर्यमुखी हंसी ने,
धुंधली रेखाओं को आकार दिया।

रूप का दीप जला
प्राण ! तुम ने घर-आंगन उजियार दिया
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Monday, July 30, 2012

बुला गए बदरा



बिखर या कजरा,
लुभा गए बदरा।

छत पर खड़ी निखारती रही डगरिया,
तुम न आए पिया, थक गई नजरिया ।

बहा गए बदरा,
पलकों का कजरा ।

सकुच सकुच खोली गीली कंचुकिया,
इतने में मुसकाई शोख बिजुरिया ।

दहक गए बदरा,
अंग अंग पियरा ।

कि बैरिन बयार खुड़काए कि‍वडि़या,
आहट पर उचट उचट जाए निंदिया ।

पहिनाए बदरा,
मोती का गजरा ।

डसती एकाकी सावन की रतियां,
आओ बतियायें हम मन की बतियां ।

उमड़ उमड़ गहरा,
बुला गए बदरा ।

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Sunday, July 29, 2012

तुम मिले ऐसे.....



तुम मिले ऐसे
द्वार पर जैसे कि वीरान हवेली के,
खिल गए हों सुमन महकती चमेली के ।
मिल गई गन्‍ध जैसे भटकते पवन को,
देव दर्शन मिला हो कि मेरे नयन को।

तुम मिले ऐसे
हो गई एक देह चूनर रंग बसंती,
रच गए गहरे रंग प्रणय हथेली के ।

आकाश को मिल गई पूनम क्‍वार की
लगी बजने वीणा मधुर मनुहार की ।
तुम मिले ऐसे
छन्‍द से उतरे कि गीत पूर्ण हो गया,
खुल गए अर्थ अबूझ तरूण पहेली के ।
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