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Friday, August 24, 2012

सूखा गांव



कहां ऋतु – मधुमास
रंभाते पशुओं का सूखा यह गांव।

अंचरा न बांधे
गंध फगुना-चैत
दृष्टियों में चुभे,
भूख पेट खेत।

यहां – वहां बबूल
थामे खड़े शूल
दीखती न फगुनाएं नीम की छांव।

कहां ग्राम- बाला
पागल प्राण करे,
कोकिला के गीत
कहां महुआ झरे।

हरियाये न बेंत
आंखों उड़े रेत
मेंहदी रचायी न धरती के पांव।

झीलों के दर्पन
निहारती न प्रीत,
टूटा झरनों का
पनघटों का गीत।

भींचे है अकाल

फूलों की मशाल

खेल-खलिहानों में पल रहे अभाव।

रंभाते पशुओं का सूखा यह गांव।।

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Thursday, August 23, 2012

खिले पारिजात है

बैन बैन में
नैन नैन में
कि सौगात है
नई बात है।


फूल-पात में
रक्‍त-रंग री
घोल-घोल तू
नव-अनंग री,

लाल-लाल सी
भर गुलाल री
तू जवान के
लगा भाल री,

नव-बसन्‍त में
दिग् दिगन्‍त में
आज अंगार
फूल-पात है ।

सखी, खेल यों
फागुनी फाग
उठे गूंज ज्‍यो
भैरवी राग,

चल पड़े जवां
गली-गांव से
भू द्वन्‍द् सब
एक भाव से,

नए चंग हैं
नव-उमंग है
हृदय में
खिले पारिजात है।

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Tuesday, August 21, 2012

बसंत की पाती

बसंत की पाती है
दूर्वा की स्‍लेट पर
फूल है जैसे लिखे, अक्षर किसी नाम के।


नगर-द्वार, जीवन में
फिर लौटी है मिठास,
अधरों औ आंखों से -
है छलकती मधु-प्‍यास ।

टेसू के लाल-लाल
रंग बसनों में मुदित
कोयल के बोलों पर, खुले अधर विराम के,
फूल है जैसे लिखे, अक्षर किसी नाम के ।


गीतों के पंख खुले
मकरन्‍दी छांहों में,
उदास मन झूलेगा
अमलतासी-बांहों में ।


कण-कण हो मुखरित सब-
नगर-गांव नाच रहा
उमंग है पांव में, आज बूढ़े ग्राम के ।

बसंत की पाती है दूर्वा की स्‍लेट पर
फूल है जैसे लिखे, अक्षर किसी नाम के।


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Sunday, August 19, 2012

तान दिया पाल, बसासंती-चुनरिया का



तान दिया पाल, बासंती-चुनरिया का।


खोल दिए वेणी-बन्‍ध
रस-क्‍यारियां भर दी गन्‍ध
मुकुलित गुच्‍छों से झूल गए
मधुवासित-फूलों के छन्‍द।

महका कौना-कौना, गांव-नगरिया का ।
तान दिया पाल, बासंती-चुनरिया का ।।


दिग्-दिगन्‍त अमलतासी धूप
नई सरसों का मुखरित रूप
उगा है मन-दर्पण के बीच
सखि, कचंनवर्णी रूप अनूप ।

सरसा रोम-रोम से, स्‍वर बांसुरिया का ।
तान दिया पाल, बासंती-चुनरिया का ।।


थाप पड़ी है फागुनी-चंग
कंठों में गीतों की उमंग
रस-भीगी उर्वश चूनर देह
हो गए एक बासंती-रंग।


पनघट ठलका रस, रसवंती गगरिया का,
आंचल-आंचल भीगा हर गुजरिया का,
तान दिया पाल, बासंती-चुनरिया का ।
तान दिया पाल, बासंती चुनरिया का ।।
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Saturday, August 18, 2012

फागुन आया



लहका लहका
महका महका
बगिया का यौवन गदराया।


तितलियों की रंगीन घातें
फूलों से भंवरों की बातें
भीगा-भीगा मौसम बहका
बहका बहका
उन्‍माद भरा फागुन आया,
बगिया का यौवन गदराया।


बैठी थी चुप-सी जो परसों,
चढ़ बतियाती पीली सरसों
शहतूती शाखों से छलका
छलका छलका
मधुमास लिए मद बौराया,
बगिया का यौवन गदराया।


बिसरे-बिसरे से छन फूले
पत्‍तों की औंक में प्रन फूले
सुधियों का कगन खनका
खनका खनका
मादल का स्‍वर भर लहराया,
बगिया का यौवन गदराया।


कि, शब्‍दों में अर्थों के फूल
गमके प्राण, कस्‍तरी धूल
ऐसे में मन-दर्पण चटका
चटका चटका
रोम-रोम मधु-मत्‍त-सरसाया,
बगिया का यौवन गदराया।
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Friday, August 17, 2012

होली आई है

बजते करताल, ढोल, डफ, उमंग छाई है,
लहक उठा है यौवन कि होली आई है।


रंग सौं भरी बाहें कोमल गोरी गोरी,
रंग ले उमंग, अंग-अंग ठाढ़ी किशोरी।


बढ़ावती उमपान खुली कंचुकी की डोरी,
रस रीति से प्रीति से प्रीतम को मले रोरीं।


मन्‍द-मन्‍द संदेश पिया का बयार लाई है,
ऋतु को ऋतुराज प्रीति कुकुम बरसाई है।


गली-गली खेल रहे रस-फाग रंग डाल-डाल,
भीगी रस-प्रीति से चहुँ ओर खुशियां निहाल।


पश्यिम से प्रियतम प्रियसी को मले गुलाल,
मुरि देखत रंग सौ रांचि मुख प्रिय को बेहाल।


दौड़े ले गुलाल नर-नारी की भीड़ आई है,

प्रिय होली-होली-होली, होली आई है।

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Thursday, August 16, 2012

बासन्‍ती पवन

धर गया बासन्‍ती पवन,
कलिका-अधर पर चुम्‍बन।

नवल कुसुमित लतिकाएं,
हो मुद्रित खग-वनिताएं।

उड़ी पंख खेल नभ में,
ज्‍यों मुख स्‍वर-कविताएं।

ठुमक ठुमक रस-क्‍यारियां
ठुमके कि सुरभि के चरण।

खोल घूंघट पांखुरी-
तनिक जो हंसी बावरी,
शोर मय गया चहुंरी ओर,
फूलां के सब गांव री।

बजी नेह बांसरी सी,
पुलक से नाच उठे मन।

सुमन केसर पराग में,
शहतूती अनुराग में,
धुल गए कलुष सभी लो
फागुनी रंग-फाग में।

उड़ता अबीर-गुलाल,
आया रंगीला फागुन।
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