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Tuesday, August 7, 2012

उग आई सुधियां





वसुधा-तल मेंहंदिया गया
ज्‍यों मेहंदी तुम्‍हारे हाथ की ।

दमकें दामिनी जैसे तुम्‍हारे
श्‍यामल कुन्‍तल में
गुंथी स्‍वर्ण-डोर,
तोड़ अधरों के अनुबन्‍ध
बिखर गई रिमझिम-सी
तुम्‍हारी हंसी चहुं ओर।

दूर्वा सी उग आई सुधियां
प्रथम-प्रणय सौगात की।

पुरवा की ताल पर
नाचे फुहारें, नाचती ज्‍यों
तुम झूम-झूम घूमर,
टूट-टूट नभ से
छुमकती आंगन में बूंदें
ज्‍यों पांवों के नूपुर।

ऐसे में मदिरा भी क्‍या,
मादक है ऋतु बरसात की।
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Monday, August 6, 2012

कोई मीत न रूठे




ओ मेरे हमजोली,
खेलें ऑंख मिचौली।

सुधियों के पार चलें,
फागन के गले मिलें,
पल-पल मुस्‍कानों के
होठों पर समुन खिलें।

साथ साथ रंग भरें
सजी है रंगोली।
महके गजरे महके,
खनके कंगन खनके,
मदमाते से चंचल
बहके से दृग बहके।

कुहुक उठी कोयलिया,
मन में मिसरी घोली।
दृगों के तीर छूठे,
अनबोले घट फूटे,
भीगे-भीगे क्षण है
कोई मीत न रूठे।

अबीर गुलाल खेलें,
रंगों की है होली।
ओ मेरे हमलोजी
खेलें आंख मिलचोली।
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Sunday, August 5, 2012

सपनों को दे भाषा





तुम आओ तो 
दोनों सपनों को भाषा,
दें अर्थ नए-नए गीत को।

कंचनवर्णी देह-गन्‍ध को,
अपनढ़े पायल के छन्‍द को,
दें अर्थ नए-नए गीत को।

अरुणाए अधरों पर पनघट-
उमसती अनचाही प्‍यास को,
पहना दें स्‍वाति बुंदकियां हम-
चूंम लें झुकते आकाश को,
तुम आओ तो
लगे गाने अधर की पिपासा,
दें मधुर हास पर्ण-पीत को,
सावन हरा गर्द-गुबार को,
दें नव प्राण सूखी डाल को,
सावनी फूलों की रीत को।

हरियायें साध की फगुनियां,
पुलक उठे केसर पराग से,
मुखर हो गुन-गुन गुनगुनाए
बोझिल चुप्पियां अनुराग से,
तु आओ तो
गूंगी यह अभिलाषा,
चाह रही सौपान मीत को,
उन्‍माद भर सजल श्रृंगार को
औ’ कजली मेघ-मल्‍हार को,
कि चाहती व्‍याहना प्रीत को।
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Saturday, August 4, 2012

बादलों के शामियाने




धरती पर बिछ गए हैं,
दूब के हरे गलीचे,
तन गए आकाश में, बादलों के शामियाने।

पांव में
मौसम के बूंदों की पायल बजती,
छांव में
प्रीत बावरी, कि पिव-पिव पुकारती।

तन-मन-प्राण हरियाये,
ये यादों के बागीचे,
धर गई पुरवाई इक गीला, छन्‍द सिरहाने।

गांव में
यहां डाल पर गदराये कच्‍चे आम,
नाँव में
अधरों की, आ बैठ जाता एक नाम।

क्षुधा-सांवरी यह भरे
कलश उरोजों पे सींचे,
आसाढ़ क्‍वांरे घन, छज्‍जों पर लगे उतराने।
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Friday, August 3, 2012

डूबे नयन में जब नयन




डूबे नयन में जब नयन ।

रस-प्‍लावित अरूण अधर पर,
कम्पित दो अधर जब धरे,
झुकीं समर्पण में पलकें
प्रश्‍वास प्रसून-सा झरे ।

गंधाये कुसुमित दो क्षण।
डूबे नयन में जब नयन ।।

कुन्‍तलों में घुमा कर-
नेहमय बजा मौन संगीत,
तिमिर गुहा-घाटियों में,
प्रसूता मधुर प्रणय-गीत।

चन्‍दन से महकें श्रम-कण ।
डूबे नयन में जब नयन ।।
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Thursday, August 2, 2012

एक गीत किसी नाम का

बैराता जब
बौर आम का,
होठों पर उग आता कोई,
एक गीत किसी के नाम का।

ओढ़ चुनरिया
बासंती धूप,
बतियाती पीली सरसों में
उभर आता है तुम्‍हारा रूप।

खेल-मेढ़ का
मुखर ग्राम का,
नाच-नाच फसलों की राधा,
गाती गीत अपने श्‍याम का।

काली कोयल
कुहू-कुहूकती,
मन की सूनी मुंडेर पर जब-
लगे दूर कहीं तुम टेरती।

रंग जाता तन,
आठ याम का,
फूलों के केसर-पराग से
गंधायित उदास मन शाम का।

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Wednesday, August 1, 2012

यह बदली



यह बदली
न जाने कहां पी आई पगली।

ठहरते न पांव कि शोर मचाए,
द्वार-खिड़कियों पे थाप लगाए,
यह बदली
झूम-झूम गाए कजली।

बरबस गहती मुझको बांह में,
औ’’ भीगे आंचल की छांह में,
यह बदली
जैसे कि तार बुनती हो तकली।

होठों तक आती मन की बातें,
दूब-सी उग आई सौगातें,
यह पगली
भेद मन के खोल गई बिजली।

यह बदली
न जाने कहां पी आई पगली।
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