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Tuesday, July 24, 2012

मदहोशी की रात है



नयनों से मत बात करो
अधरों से कुछ मधु घोलो
होश की न बात कहो तुम कि मदहोशी की रात है।

नभ के आंगन में सजी,
सितारों की बारात है,
देख धरा का प्‍यार प्राण ! 
गलता चाँद का गात है।
प्रीति-घट रीते मत धरो
अधर के पनघट डुबोलो
पलक की गोद में भीगी, मधु-प्रणय की बरसात है।

मन के सरोवर में खिले,
प्रिये ! प्रणय-जलजात है,
अभिलाषा का शिशु-छोना
मचला, चाह अज्ञात है।
बीच मंझदार मत तरो
बांहों के तट मन घोलो
गीत का चाँद ढ़ल रहा, पास आओ मेरी सौगात है।
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Monday, July 23, 2012

शिशिर गीत



प्राण ! रूपवंती यह शिशिर की रात है।

चल रहा शिथिल-मन्‍द-भीना वातास है,
जरा धीरे उठाना ज्‍योति का आंचल,
बुझ न जाए कहीं रूप का दीपक सलोना,
उड़ रहा शिखा पर यह पतंगा पागल।
लो के अधर पर कम्‍पती मीठ बात है।
प्राण ! रूपवंती यह शिशिर की रात है।।

आकाश वीणा की रश्मियों के तार,
रो उठे हों ज्‍योंे संगीत झन्‍कार में,
चम्‍पे सी अंगुलियों का आघात पा,
गीत के हंस आ रहे तुम तक अभिसार में।
ज्‍योत्‍सना की लहर धुली, नीरजा शान्‍त है।
प्राण ! रूपवंती यह शिशिर की रात है।।

रूप का कुम्‍कुम यह नीरजा की राह में,
ओ कंचुकी की ओट से उमंगता यौवन,
प्राण ! क्‍या करने को करता विवश है,
स्‍वपन के जाम पी हो रहे चंचल नयन।
कर गुजरने को है क्‍या, यह अज्ञात है।
प्राण ! रूपवंती यह शिशिर की रात है।।

प्राण ! क्‍या, लो मंच ही पूरा बदल गया,
कौन खूबियों के साथ परदा उठाया,
कम से हटकर करधनी लौट रही,
वेदना क्‍या बताऊं स्‍पर्श ने मेरे रूलाया।
जीत मेरी, तुम्‍हारी हार से मात है।
प्राण ! रूपवंती यह शिशिर की रात है।।
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Sunday, July 22, 2012

शरद्-निशा

शरद् निशा में, प्राण ! तुम्‍हारी मधुर याद आती है। 

उतर पड़ी भू पर नभ से, चांदी सी धुली चांदनी, 
झिलमिल-झिलमिल भर मांग सितारों से कितनी मनहर,
सौरभ मन्‍द पवन बह जाता, कह कर बात तुम्‍हारी, 
लाज-गुलाबी सपने हँस-हँस जाते कम्पित पलकों पर, 

दिशि-दिशि से उठती विरह गीत की स्‍वर लहरी,
मेरे कानों पर खोई-खोई सी मंडराती है। 
मृदु-स्‍वप्निल प्रणय-मिलन की सुधि आ जाती है।
शरद् निशा में, प्राण ! तुम्‍हारी मधुर याद आती है।

आया बसंत पर कोकिल कूक नहीं पाई, 
सूने-सूने जीवन पर रोते हैं तारे, 
टलती जाती क्‍यों घड़ि‍यां या मधुर मिलन की, 
तुम मिलो कि मेरा तन-मन प्राण पुकारे। 

रूप संवारे किस यौवन-दर्पण में उर की प्रीति तरुण, 
शशि की किरणों पर परछाई अकुलाती है, 
मन की व्‍याकुलता नयनों में घिर आती है, 
शरद् निशा में, प्राण ! तुम्‍हारी मधुर याद आती है।

Saturday, July 21, 2012

अधर मौन क्‍यों रहते हैं ?




क्‍यों रूक-रूक जाती है मीठी बात गले तक आ-आ कर,
नयन परस्‍पर बोला करते, अधर मौन क्‍यों रहते है ?

उषा-सुकन सी मुस्‍कानें होठों पर नचती आती है,
लाज गुलाबी पंखुडि़यों सी, पलकें झपक क्‍यों जाती है ?
पीड़ा का क्‍यों भार उछलते उर क्‍यों स्‍पन्‍दन सहते है ?
नयन परस्‍पर बोला करते, अधर मौन क्‍यों रहते हैं ?

तुम्‍हीं, सब कहीं व्‍यक्‍त दृगों में, अपना रूप बसाकर,
प्‍यास बढ़ाते जाते जब तब, स्‍वप्‍नों में आ-आ कर,
स्‍वप्निल-उर्मिल प्रणय संदेसे, तट दूरी से कहते हैं,
नयन परस्‍पर बोला करते, अधर मौन क्‍यों रहते हैं ?

मिलता मधुप कली से गा-गा, चूम-चूम रस लेता है,
जलती दीप-शिखा में जल-जल, प्राण पतंगा देता है,
दो बूंद-बूंद बन हम प्रीत लहर पर, दूर-दूर क्‍यों बहते हैं ?
नयन परस्‍पर बोला करते, अधर मौन क्‍यों रहते हैं ?
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Friday, July 20, 2012

स्‍नेहिल स्‍मृति



दीप जलाए सुधियों के द्वार खड़ी अकेली तुम-सी भोली
यह चम्‍बई सांझ तुम्‍हारे लहराते श्‍यामल कुन्‍तल-सी।।
क्षितिज अंगूरी-पल्‍लव थहिकत दिवस किरणों ने चूम लिए,
सौरभ के पर चंचल तुम्‍हारी श्‍वासों की केसर पिए।
अधर चूम कर मेरे उर तक रेख खींच दी चंचल-सी।
यह चम्‍बई सांझ तुम्‍हारे लहराते श्‍यामल कुन्‍तल-सी।।
रेशमी चुनरी ओढ़े रस-सिन्‍धु स्‍नात यह धवल रात,
उन्‍मत्‍त रजनी की गोद में पुलक से आपूरित पात-पात।

यह नव-नील कोमल छांह तुम्‍हारेमुख के सुषमा-जल सी।
यह चम्‍बई सांझ तुम्‍हारे लहराते श्‍यामल कुन्‍तल-सी।।
आमन्‍त्रण देता ठहर चन्‍दा को लहरों का मौन संगीत,
हर रोम-रोम में प्‍यार पुलक, अधरों पर स्‍पन्दित मधुर गीत।
दृष्टि-दूतिका उड़ी स्‍मृतियों के पार तुम्‍हारे अंचल सी।
यह चम्‍बई सांझ तुम्‍हारे लहराते श्‍यामल कुन्‍तल-सी।।

मिलन-द्वार प्राणों का सौरभ ले श्‍वासों का कपूर जल रहा,
तुम्‍हारी अर्चना में निरन्‍तर गीत का चांद गल रहा।
मौम-तन में पल रही रह-रह, फिर पिपासा ज्‍योति जल-सी।
यह चम्‍बई सांझ तुम्‍हारे लहराते श्‍यामल कुन्‍तल-सी।।
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Thursday, July 19, 2012

स्‍वर लहरी




इन्‍ही श्‍वास उर्मियों में उछलते गिरते प्रतिक्ष,
इन्‍ही घनों में स्‍वप्‍न शून्‍य-सा रोता चातक मन,
इन्‍हीं खगों-सी मुक्‍त कल्‍पना में कवि की स्‍वर-नहरी
कर देती मस्‍त इन्‍हीं लताओं-सी पुलकित तन-मन।

मेरे जीवन में संचित है उत्‍थानप-तन,
मेरे मानस-पट पर अंकित हास-रुदन ।।

घोर तमिस्‍त्रा में तारों के मणि-दीपक मुस्‍काते,
दूर कहीं बांसों के वन में बंसी के स्‍वर गाते,
जल उठती ज्‍वाला बुझती सहसा, अश्रु बरस जाते,
तो वर देते कवि के गीत अधर पर अकुलाते।

मेरे कर में बंधा सृष्टि का प्रजल-सृजन,
स्‍वर में बंधी जागरण की अभिनव गर्जन।।

मेरे कदमों की आहट पर पर्वत शीष झुकाते,
मैं नि:शंक बढ़ा चलता निज पथ पर हंसते-गाते,
बुद्बुद् मेरे मन के मीत, नहीं मेरे तो गीत
सागर की लहरों पर अम्‍बर पर मचल लहराते।।

मेरे स्‍वर में गूंज रही नवयुग की जागृत धड़कन।
मेरे साहस में अंगड़ाई लेता जन-जन का मन।।
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Wednesday, July 18, 2012

मेरे अमिट विश्‍वास हो


कंटकित हो मुस्‍कुराती नवल सुमनार्चित प्रशाखा,
हृदय उपवन में प्रफुल्लित वेदना के हास हो।

प्रगति प्रांगण में तुम्‍हीं,
मेरे अमिट विश्‍वास हो ।

मधुर अधरों पर सुशोभित मौन मन की मूक भाषा,
विरल भावों के श्रृंगारित दिवित आकाश हो।
चन्‍द्रबाला-सी उमर नीलाम्‍बरा मुकुलित कलेवर,
उर गगन में छिटक बरसाते सुधार विद्यु-हास हो।

प्रगति प्रांगण में तुम्‍हीं,
मेरे अमिट विश्‍वास हो।

मुक्‍त नभ की एक खगमाला, दिवंगत नीड़ हो तुम,
मंदिर छाया में प्रणय के गीतिमय नि:श्‍वास हो।
तुम नवोदित सुमन, मैं गुनगुन-गुनन्‍ की मधुर पुकार,
विश्‍व-वीणा पर निनादित स्‍वरित स्‍वप्‍नाकाश हो।

प्रगति प्रांगण में तुम्‍हीं,
मेरे अमिट विश्‍वास हो।
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