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Wednesday, August 29, 2012

फूलों की बहारों को रोता है बुलबुल


शबे-महताब से रोशन है उनका मुआ दिल।
बैठे हैं हम यों करके चिराग अपने गुल।।

मुफलिसी में उगाते हम आंसुओं की सफल,
सुरा-साकी से पुरनूर है उनकी महफिल।

लहू से बनाया जिन्‍होंने अपना राज-पथ,
चल के उस पे कुछ सिरफिर पा गए मंजिल ।

हाल पे अवाम के उन्‍हें नहीं कुछ मलाल,
रहबर हमारे वो पड़े हैं हो के गाफिल ।

खुशबू न नूर गुलाबों का अब अल्‍फाज में,
सियासत की मुलाजिम हो गई कि आज गजल ।

बहारें कहां, चमन कैसे कि कफस में बंद,
फूलों की बहारों को रोता है बुलबुल ।
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Tuesday, August 28, 2012

चुल्‍लू भर छांव को ......


तरस गए कि चुल्‍लू भर छावं को आंगन में,
आग लगी हे सरस हवाओं के दामन में।

किरणों के दंश सहे, प्‍यार की इक बूंद को-
रटते-रटते पिव-पिव कजराए सावन में ।

भीतर का अमूर्त मन, इतना निरर्थक,
गड-मड हुई सतरंगी-उमंगे यौवन में ।

आदमी आदमी में, बांट के दूरियां ये-
मंदिर उलझाते रहे, पावन-अपावन में।

वर्षों से पाले, परिचय के भ्रम टूट गए,

कैसे पहिचान करें, रहजन ओ पाहुन में ।

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Monday, August 27, 2012

आदमी है सूखी नहर




यहां कोई किसी को नहीं पहचानता
यह अजनबी शहर, लोगों।
रिश्‍वतों पर खड़े गगनचुम्‍भी भवन यहां
होती नहीं सहर, लोगों ।

आदमी की शक्‍ल में दौड़ती भीड़
मगर आदमी नहीं कहीं है,
आंख में न स्‍नेह का पानी यहां
आदमी है सूखी नहर लोगों । 

नारों के कलीदें है बेशुमार 
हमें खाने को लाठी-गोली,
वोट की खाली प्‍यालियों में
भर-भर पीते हैं हम जहर, लोगों ।

मरक्‍यूरी रोशनी के नीचे
फुटपाथ पर दम तोड़ती जिन्‍दगी,
जगाने को मगर ईमान
मंदिरों में रोज बजते गजर, लोगों ।

पढ़ते ही रहे सिर्फ
समस्‍याओं का समीकरण
हो पाया न हल,
समेट कर अपनी जाजम
बना चला दिगम्‍बर यह दिसम्‍बर लोगों ।
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Sunday, August 26, 2012

शरद्


कांसों के चंवर डुलाती
सन-बिच्छिया छुम छुमकाती
नीलाभ गगन से धरती पर, उतरी शरद् कपूरी।

उलझा था जो कहीं
श्‍याम घटा के सघन केश में
निकला चांद
धुला-धुला सा दूधिया परिवेश में

करे रसवंती अभिषेक
ढुलते दुग्‍ध-कलश अनेक
लिपे पुते आंगनों नाचती इच्‍छाएं मयूरी।

अल्‍हड़ यौवना सी
पकी-पकी बाजरे की फसल
अलगोजे की धुन में
बुन रही ज्‍यूं सपनों की गजल

निरख जवानी खेल की
महकी खुशबू रेत की,
मुसकायी क्‍वार के धान-सी, बरसों की मजबूरी।

जादू सा है छाया
हर भवन में डोल गई गन्‍ध
रोम-रोम में पुलक
स्‍वरित है, प्रणय गीतों के छन्‍द

रूपायित हुआ मन गेह
गुलाब सी गंधायित देह
दीप जलाती तुलसी बिरवे नीचे, शाम सिन्‍दूरी।
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Saturday, August 25, 2012

अकाल के नाम




कैसे कैसे
काटे हैं लमहे गिनगिन,
कैसे जीएं
सब सून है पानी बिन।

अन्‍तर्मन को
खरोंचे दफ्तरी बात,
पल-पल होती
शकुनी मुंशियाना बातें,

सूरज की किरणें
चुभती तन को
फक्‍क उजले
कागज में छिपे ज्‍यों आलपिन।

ऊपर दूर आकाश में
उड़ती चीलें,
नीचे रेतीली
हथैली पे सूखी झीलें,

धरती चटकी
जैसे चूने की तगार
ऐसे ऐसे
चटकते हैं हमारे दिन।

अब भी
यहीं कहीं है जीता होरी
बिन छत काटी
पूस की रातें निगोरी,

करम जला
जनमा साथ लिए अकाल
खटकता है
मजूरी को कि ‘होरी’ छिनछिन।
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Friday, August 24, 2012

सूखा गांव



कहां ऋतु – मधुमास
रंभाते पशुओं का सूखा यह गांव।

अंचरा न बांधे
गंध फगुना-चैत
दृष्टियों में चुभे,
भूख पेट खेत।

यहां – वहां बबूल
थामे खड़े शूल
दीखती न फगुनाएं नीम की छांव।

कहां ग्राम- बाला
पागल प्राण करे,
कोकिला के गीत
कहां महुआ झरे।

हरियाये न बेंत
आंखों उड़े रेत
मेंहदी रचायी न धरती के पांव।

झीलों के दर्पन
निहारती न प्रीत,
टूटा झरनों का
पनघटों का गीत।

भींचे है अकाल

फूलों की मशाल

खेल-खलिहानों में पल रहे अभाव।

रंभाते पशुओं का सूखा यह गांव।।

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Thursday, August 23, 2012

खिले पारिजात है

बैन बैन में
नैन नैन में
कि सौगात है
नई बात है।


फूल-पात में
रक्‍त-रंग री
घोल-घोल तू
नव-अनंग री,

लाल-लाल सी
भर गुलाल री
तू जवान के
लगा भाल री,

नव-बसन्‍त में
दिग् दिगन्‍त में
आज अंगार
फूल-पात है ।

सखी, खेल यों
फागुनी फाग
उठे गूंज ज्‍यो
भैरवी राग,

चल पड़े जवां
गली-गांव से
भू द्वन्‍द् सब
एक भाव से,

नए चंग हैं
नव-उमंग है
हृदय में
खिले पारिजात है।

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