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Wednesday, September 5, 2012

..... परेशां बागबां




अजीजों की मोहब्‍बत से भी अब गिला होता है।
औ’ आबे-जमजम में भी अब जहर मिला होता है।।

गुल कम गुलिस्‍तां में कांटे  बहुत परेशां बागबां,
सहरा में गुल मोहब्‍बत का कहां खिला होता है।

पूजा के नहीं ये मंदिर-मस्जिद ये गुरूद्वारे,
अब फिरकापरस्‍ती फितरतों का किला होता है।

सुहाता नहीं काजल आंख को आंख फोड़े देती,
दिल से दिल का कहां इस जहां में सिला होता है।

बेकसों के खूं से रंगे हाथ किसके नहीं यहां।
आजकल सुबह-शाम बस यही सिलसिला होता हैा
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Tuesday, September 4, 2012

लहर से दूर कूल हो गए




चांद-सूरज, धरती औ’ आकाश सब बबूल हो गए।
टिमटिताते तारे चुभते द़ष्टियों में शूल हो गए।।

फ्रीज हुआ जा रहा कि आदमी बन्‍द गवाक्षों में,
बसंती बेला-चमेली अब प्‍लास्टिकी फूल हो गए।

सर्जक ही संहारक हो कर रहे विश्‍व को आक्रांत,
विज्ञानी-समीकरण हल करते-करते मूल हो गए।

क्रिस्‍टल-कम्‍प्‍यूटर है विकास के बढ़ते चरण मगर-
आदर्श थे जितने सब रेडियोधर्मी धूल हो गए।

धरा से नभ तक सिर उठाए खड़े कि बारूदी-पहाड़,
गगन में शांति के कबूतर उड़ाना फिजूल हो गए।

जुलूस की भाषा बोलते हैं विसंगतियों के पुरोहित,
उजाले की इबारत काटना जिनके उसूल हो गए।

बिसर गए संकल्‍प सभी साथ-साथ अंजुलि भरने के,
डूबते-उतराते रहे, लहर से दूर कूल हो गए।
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Monday, September 3, 2012

गांठ लगे फीते


उमर के घट रीते हुए,

यूं ही ऊब पीते हुए।



सर्पीले शहर हम रहे,

मरते हुए, जीते हुए।



गांव अलगोजे वो छांव,

याद आते, बीते हुए।



खेत, अमराइयों से कट,

कि दफ्तरी सुभीते हुए ।



जुलूसों और भीड़ में,

भाड़े के पतीले हुए।



तार-तार हुई चदरिया,

कब तक रहें सींते हुए।



सरकारी फाइलों के हम,

गांठ लगे फीते हुए।

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Sunday, September 2, 2012

रिश्‍तों का सवाल



उब लगती है जब भी रिश्‍तों का सवाल आता है।।
सुन्‍न हो गया हृदय न इसको अब जलाल आता है।

होम कर दी खुशनुमा जिन्‍दगी जिनकी मिजाजपुरसी में,
हमीं पर तोहमत देते हैं क्‍यों ? सिर्फ यह ख्‍याल आता है।

शिराओं में दौड़ता न अब खूं, यारों जिस्‍म अब फ्रिज बन गया,
दिखता हयादार न अब, कहां खूं में उबाल आता है।

खड़ा गहरी घाटियों में सुना रहा पत्‍थरों को गजल,
दोस्‍ती का कहीं से न अब कोई रूमाल आता है।

हम जिन्‍हें समझे थे गुलाब, वे कड़वे कनेर निकले,
बबूलों में कमी क्‍या ‘’रघुनाथ’’ यों रसाल आता है!

Saturday, September 1, 2012

अर्थ की यात्रा



रिश्‍ते भी जो किए हैं हमने तो दर्द से हंसते-हंसते।
गम मिले तो झटक दिए राह की धूल से चलते-चलते।

पंछी वो हैं हम न गिला मौसम से न मोह किसी शाख से,
फिजाओं से भी जो गुजरे हैं हम तो चहकते-चहकते।

भोलापन तो देखिए हमारा, देख के चांद पानी में,
खिलखिला दिया किए उस बचपन की तरह मचलते-मचलते।

नजर आता न फर्क गुबारे-राह और शमशान की राख में-
नहा के आऐ हम मस्‍त औलिया – से टहलते-टहलते।

ये सरोवर ये झरने व्‍यवहार नहीं करते अब मित्र-सा,
दरिया के किनारे भी रहते हम तिश्‍नगी सहते-सहते।

मुहाल दिले-मुराद यहां लोग कमनजर जो सताइश,
यार ! शहकार रचनाएं भी रह जाती है छपते-छपते ।

मन की हर गजल असमंज भरी है यहां पे ‘’यादवेन्‍द्र’’
अर्थ की यात्रा में उम्र तमाम हुई यों ही पढ़ते-पढ़ते।
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Thursday, August 30, 2012

नई यात्रा पर चलें


मिलते थे जो कि कल तक बांह पसार गले।
चटक गए रिश्‍ते, रिश्‍तों पे खंजर चले।।

उठा जो आरजूओं का धुंआ बस्‍ती से,
खूं का कतरा कतरा यह अश्‍कों में ढले।

जिन्‍दगी सारी हुई यहां पे धुआं-धुआं,
ख्‍यालों-ख्‍वाबों के पेकर हैं धुन्‍धले।

सच तो गूंगा यहां छल बहुत बातूनी,
है छलावों के पग-पग रेशमी जलजले।

कि हुक्‍म वही हुक्‍मरान वही है प्‍यादे,
वही है चेहरे, सिर्फ नाम-पट्ट बदले।

बदलते मौसम के मानिन्‍द इनके उसूल,
है रोज मल्‍बूस बदलने के सिलसिले।

अन्‍धेरी गली बस्तियों में, यारों!
कब अलस्‍सुबह के खुश्‍नुमा मन्‍जर खिलें?

भूल के सारे शिकवे-शिकायत, हमदम!
फिर सूरज की तरह नई यात्रा पे चलें।
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Wednesday, August 29, 2012

फूलों की बहारों को रोता है बुलबुल


शबे-महताब से रोशन है उनका मुआ दिल।
बैठे हैं हम यों करके चिराग अपने गुल।।

मुफलिसी में उगाते हम आंसुओं की सफल,
सुरा-साकी से पुरनूर है उनकी महफिल।

लहू से बनाया जिन्‍होंने अपना राज-पथ,
चल के उस पे कुछ सिरफिर पा गए मंजिल ।

हाल पे अवाम के उन्‍हें नहीं कुछ मलाल,
रहबर हमारे वो पड़े हैं हो के गाफिल ।

खुशबू न नूर गुलाबों का अब अल्‍फाज में,
सियासत की मुलाजिम हो गई कि आज गजल ।

बहारें कहां, चमन कैसे कि कफस में बंद,
फूलों की बहारों को रोता है बुलबुल ।
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