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Sunday, September 2, 2012

रिश्‍तों का सवाल



उब लगती है जब भी रिश्‍तों का सवाल आता है।।
सुन्‍न हो गया हृदय न इसको अब जलाल आता है।

होम कर दी खुशनुमा जिन्‍दगी जिनकी मिजाजपुरसी में,
हमीं पर तोहमत देते हैं क्‍यों ? सिर्फ यह ख्‍याल आता है।

शिराओं में दौड़ता न अब खूं, यारों जिस्‍म अब फ्रिज बन गया,
दिखता हयादार न अब, कहां खूं में उबाल आता है।

खड़ा गहरी घाटियों में सुना रहा पत्‍थरों को गजल,
दोस्‍ती का कहीं से न अब कोई रूमाल आता है।

हम जिन्‍हें समझे थे गुलाब, वे कड़वे कनेर निकले,
बबूलों में कमी क्‍या ‘’रघुनाथ’’ यों रसाल आता है!

Saturday, September 1, 2012

अर्थ की यात्रा



रिश्‍ते भी जो किए हैं हमने तो दर्द से हंसते-हंसते।
गम मिले तो झटक दिए राह की धूल से चलते-चलते।

पंछी वो हैं हम न गिला मौसम से न मोह किसी शाख से,
फिजाओं से भी जो गुजरे हैं हम तो चहकते-चहकते।

भोलापन तो देखिए हमारा, देख के चांद पानी में,
खिलखिला दिया किए उस बचपन की तरह मचलते-मचलते।

नजर आता न फर्क गुबारे-राह और शमशान की राख में-
नहा के आऐ हम मस्‍त औलिया – से टहलते-टहलते।

ये सरोवर ये झरने व्‍यवहार नहीं करते अब मित्र-सा,
दरिया के किनारे भी रहते हम तिश्‍नगी सहते-सहते।

मुहाल दिले-मुराद यहां लोग कमनजर जो सताइश,
यार ! शहकार रचनाएं भी रह जाती है छपते-छपते ।

मन की हर गजल असमंज भरी है यहां पे ‘’यादवेन्‍द्र’’
अर्थ की यात्रा में उम्र तमाम हुई यों ही पढ़ते-पढ़ते।
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Thursday, August 30, 2012

नई यात्रा पर चलें


मिलते थे जो कि कल तक बांह पसार गले।
चटक गए रिश्‍ते, रिश्‍तों पे खंजर चले।।

उठा जो आरजूओं का धुंआ बस्‍ती से,
खूं का कतरा कतरा यह अश्‍कों में ढले।

जिन्‍दगी सारी हुई यहां पे धुआं-धुआं,
ख्‍यालों-ख्‍वाबों के पेकर हैं धुन्‍धले।

सच तो गूंगा यहां छल बहुत बातूनी,
है छलावों के पग-पग रेशमी जलजले।

कि हुक्‍म वही हुक्‍मरान वही है प्‍यादे,
वही है चेहरे, सिर्फ नाम-पट्ट बदले।

बदलते मौसम के मानिन्‍द इनके उसूल,
है रोज मल्‍बूस बदलने के सिलसिले।

अन्‍धेरी गली बस्तियों में, यारों!
कब अलस्‍सुबह के खुश्‍नुमा मन्‍जर खिलें?

भूल के सारे शिकवे-शिकायत, हमदम!
फिर सूरज की तरह नई यात्रा पे चलें।
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Wednesday, August 29, 2012

फूलों की बहारों को रोता है बुलबुल


शबे-महताब से रोशन है उनका मुआ दिल।
बैठे हैं हम यों करके चिराग अपने गुल।।

मुफलिसी में उगाते हम आंसुओं की सफल,
सुरा-साकी से पुरनूर है उनकी महफिल।

लहू से बनाया जिन्‍होंने अपना राज-पथ,
चल के उस पे कुछ सिरफिर पा गए मंजिल ।

हाल पे अवाम के उन्‍हें नहीं कुछ मलाल,
रहबर हमारे वो पड़े हैं हो के गाफिल ।

खुशबू न नूर गुलाबों का अब अल्‍फाज में,
सियासत की मुलाजिम हो गई कि आज गजल ।

बहारें कहां, चमन कैसे कि कफस में बंद,
फूलों की बहारों को रोता है बुलबुल ।
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Tuesday, August 28, 2012

चुल्‍लू भर छांव को ......


तरस गए कि चुल्‍लू भर छावं को आंगन में,
आग लगी हे सरस हवाओं के दामन में।

किरणों के दंश सहे, प्‍यार की इक बूंद को-
रटते-रटते पिव-पिव कजराए सावन में ।

भीतर का अमूर्त मन, इतना निरर्थक,
गड-मड हुई सतरंगी-उमंगे यौवन में ।

आदमी आदमी में, बांट के दूरियां ये-
मंदिर उलझाते रहे, पावन-अपावन में।

वर्षों से पाले, परिचय के भ्रम टूट गए,

कैसे पहिचान करें, रहजन ओ पाहुन में ।

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Monday, August 27, 2012

आदमी है सूखी नहर




यहां कोई किसी को नहीं पहचानता
यह अजनबी शहर, लोगों।
रिश्‍वतों पर खड़े गगनचुम्‍भी भवन यहां
होती नहीं सहर, लोगों ।

आदमी की शक्‍ल में दौड़ती भीड़
मगर आदमी नहीं कहीं है,
आंख में न स्‍नेह का पानी यहां
आदमी है सूखी नहर लोगों । 

नारों के कलीदें है बेशुमार 
हमें खाने को लाठी-गोली,
वोट की खाली प्‍यालियों में
भर-भर पीते हैं हम जहर, लोगों ।

मरक्‍यूरी रोशनी के नीचे
फुटपाथ पर दम तोड़ती जिन्‍दगी,
जगाने को मगर ईमान
मंदिरों में रोज बजते गजर, लोगों ।

पढ़ते ही रहे सिर्फ
समस्‍याओं का समीकरण
हो पाया न हल,
समेट कर अपनी जाजम
बना चला दिगम्‍बर यह दिसम्‍बर लोगों ।
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Sunday, August 26, 2012

शरद्


कांसों के चंवर डुलाती
सन-बिच्छिया छुम छुमकाती
नीलाभ गगन से धरती पर, उतरी शरद् कपूरी।

उलझा था जो कहीं
श्‍याम घटा के सघन केश में
निकला चांद
धुला-धुला सा दूधिया परिवेश में

करे रसवंती अभिषेक
ढुलते दुग्‍ध-कलश अनेक
लिपे पुते आंगनों नाचती इच्‍छाएं मयूरी।

अल्‍हड़ यौवना सी
पकी-पकी बाजरे की फसल
अलगोजे की धुन में
बुन रही ज्‍यूं सपनों की गजल

निरख जवानी खेल की
महकी खुशबू रेत की,
मुसकायी क्‍वार के धान-सी, बरसों की मजबूरी।

जादू सा है छाया
हर भवन में डोल गई गन्‍ध
रोम-रोम में पुलक
स्‍वरित है, प्रणय गीतों के छन्‍द

रूपायित हुआ मन गेह
गुलाब सी गंधायित देह
दीप जलाती तुलसी बिरवे नीचे, शाम सिन्‍दूरी।
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