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Friday, November 2, 2012

ग़ज़ल


आंखें में मेरी तुम जो झांक कर देखोगे।
एक पसरा हुआ रेतीला डर देखोगे।।
पिंजरों में बन्‍द तोते रटते राम नाम,
बहुत खूबसूरत, मगर कटे 'पर' देखोगे।
ले के ख्‍वाहिश जिधर भी सड़क पे निकलोगे,
जला हुआ, धुंए में डूबा शहर देखोगे।
किसके रंगे नहीं हाथ आदमी के खूं से,
जिधर देखोगे हाथ में खन्‍जर देखोगे।
धूल से यूं धुंधला गए बिम्‍ब दर्पणों के,
कि होठों पे फूल की हंसी किधर देखोगे।
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Thursday, November 1, 2012

विधवा इच्‍छाएं



सांप लिपटे है चन्‍दन क्‍या देखें।

आंसू भरे नयन से गगन क्‍या देखें।।

चेहरे पे चिपकी हैं उदासियां,

दरका हुआ मन, दर्पण क्‍या देखें।

सूरज ही जब हो तिमिर के घर रहन,

मुफ़लिसी में सहर की किरन क्‍या देखें।

फूल भी है, खुशबू भी सेज पे-

आंख लगती नहीं स्‍वप्‍न क्‍या देखें।

शे रही सिर्फ विधवा इच्‍छाएं,

टूटे पड़े सुहाग, कंगन क्‍या देखें।

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Wednesday, October 31, 2012

खुशियों से ज्‍यादा ग़म



रूप थी, यौप भी, दिल न था उठा के नकाब जो देखा।

और ज्‍यादा चुभे कांटे, छू के टीनी गुलाब जो देखा।।

मौसम की बदगुमानी तो देखो, घाव फिर हरे हो गए,

कि फूल सूखे ही मिले, हमने खोल के किताब जो देखा।

बाद मुद्दत के नींद आई थी, यह तो किस्‍मत की बात है,

आंख कब लगती नहीं किसी तरह कल से ख्‍वाज जो देखा।

दोस्‍त भी थे, वफा भी थी और वे कुछ हम सफर भी साथ,

किनारा कर गए वो सभी, दर्द का सैलाब जो देखा।

करते रहे ता उम्र हम जिन्‍दगी और आंसुओं से सुलह,

खुशियों से ज्‍यादा ग़म मिले हमने उम्र का हिसाब जो देखा।

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Tuesday, October 30, 2012

रद्दी के अखबार हो गए

रद्दी के अखबार हो गए

सुबह की खबर थे, पढ़ लिए बाद बेकार हो गए।

कबाड़ी के हाथ बिके, रद्दी के अखबार हो गए।।

ऐसी चली आंधियां, तिनका-तिनका हो उड़ गए-

कि घर गरीब के, बिना छप्‍पर की दीवार हो गए।।

हुआ करते थे कभी कि खुश्‍नुमा मौसम की आहट,

जेब में सूखे फूल हैं, अब बीती बहार हो गए।

नींव के पत्‍थर रहे हम, जब भी बना कोई किला,

वो बुर्ज पर चढ़ गए, हम दर-किनार हो गए।

मंच भी है अभिनेता भी, मगर कलकार नहीं,

पर्दा उठाने-गिराने वाले सूत्रधार हो गए।

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Monday, October 29, 2012

इन्‍हीं के घर रहन मेरी उम्र की शाम है



इन्‍हीं के घर रहन मेरी उम्र की शाम है
मेरी सिसकती शेष खुशियों के ग्राम है,
कुर्सियों से चिपके लोगों के नाम हैं।
बैसाखियों पर चढ़ जो हो गए हैं हुजूर,
सभी को मुझ बौने का बा-अदब सलाम है।
रोशनी के नाम पर अंधेरे बांट रहे,
इनकी जेबों में बन्‍द सुबह की घाम है।
कल तक के हम-सफर आज हो गए खजूर,
इनके कटे-साये में जिन्‍दगी तमाम है।
कागज-सा दिन छेद दिया आलपिनों से,
इन्‍हीं के घर रहन मेरी उम्र की शाम है।

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Monday, October 22, 2012

फ़ुज़ुल चेहरा



दफ्तर जाते, था फूल सा चेहरा।
लौटे तो, था धूल सा चेहरा।।
टेबिल से टेबिल तक मात सही,
प्रारूप की, था भूल सा चेहरा।
खेल सका न गांठ लगा फीता,
अफ़सर को, था कब क़बूल चेहरा?
न लेने में था न देने में यह
अपना तो था, उसूल चेहरा।
मुन्‍शीगिरी से थे हम अनाड़ी
इसीलिए था फ़ुज़ुल चेहरा।
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Sunday, October 21, 2012

कोई बात तो हो


ऐसे में कैसे करें बात, कोई बात तो हो।
बीते तो कैसे बीते रात, कोई बात तो हो।।
उमस भरी गुमसुम-सी ठहरी कहीं हवा है,
लरजे तो सही कि पीपल-पात, कोई बात तो हो।
दूरियां भी नाप लेंगे हम डगमगाते पांव से,
अधर हो धरी यदि सौगात, कोई बात तो हो।
आंसुओं से करलें हम सुलह भी यदि हाथ में हो-
किसी के मेहन्‍दी वाले हाथ, कोई बात तो हो।
बादल हो या बहकाहुआ शराबी-सा मौसम हो,
रिमझिम सरगम हो कि बरसात, कोई बात तो हो।
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