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Thursday, September 13, 2012

नाकारा संदूक


एक बहुत पुराना
काला-कलूटा, नाकारा
लोहे का संदूक
बड़े जतन से संभले रखता हूं
क्‍योंकि
उससे चिपकी है मेरे बचपन की यादें।

मैं महसूस करता हूं
उस
स्‍वर्गीय मां के बूढ़े हाथों के स्‍पर्श
जो
कपड़ों की तहों के नीचे
छुछपाकर रखे पैसों में से
एक पैसा
चुपके से
नन्‍हीं हथेली पर रख
मेरी मुट्ठी स्‍नेह से बंद कर दिया करती थी।

मैं देखता हूं
आज भी
रूपया, चाकलेट या बिस्‍कुल लेने को
मेरा पोता
मेरी कमीज का कोना पकड़े
घूमता है आगे पीछे
मेरे
उस पुराने, नाकारा
संदूक के।
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Wednesday, September 12, 2012

कृतघ्‍न हूं मैं......

हे मां,

तुम्‍हारी

शस्‍य-श्‍यामला सुमनों से चित्रांकित

अल्‍पना को,

नीलाभ गगन में

पंख पसारे उड़ती विहंगों की

मुक्‍त कल्‍पना को,

कुलांचे भरती मृग छौनों की,

निश्‍छल भावना को,

अक्षम अहम् की तुष्टि के लिए

मेरी आदिम उग्रता ने

रक्‍त रंजित कर दिया।

 

हे मातृ भूमि,

तुम्‍हारी

गंगा-यमुना/चंचल सरिताओं के

अमृत तुल्‍य जल से

मेरे कितने ही

पितरों का उद्धार हो गया,

तुम्‍हारे

इस सब उपकार/आशीष के लिए

मझे नत मस्‍तक हो प्रणाम करना था

किन्‍तु मेरी बौनी पंगु कल्‍पना

तुम्‍हारा निराकार नीलिमा की ओर

मुट्ठियां भर भर

बारूद उछालती रही
कितना कृतघन हूं मैं....

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Tuesday, September 11, 2012

रेत की नदी


रेत की नदी
यह मेरे पिता का तीसरा काव्‍य संग्रह है।
कविता के सन्‍दर्भ में अपनी ओर से कोई भूमिका लिखना नहीं चाहता। यूं कविता हर मनुष्‍य को अपने जन्‍म के साथ प्राप्‍त होती है,‍ फिर भी यह उस व्‍यक्ति की अथ्‍भव्‍यक्ति व अभिव्‍यंजना पर निर्भर करती है कि वह अपने भाव-गुफंन को कैसे बुनता है।
ये कविताएं भाषा की क्लिष्‍टता, बौद्धिकता के बोझ से मुक्‍त, मिट्टी में खेलते अबोध बालक के तुतलाते शब्‍दों में सपाट-बयानी भर है। मुझ अकुशल कलाकार की गढ़न, अलंकारिता, काव्‍यगत-शिल्‍प का सुख चाहे न दे पाए, मगर इनकी पारदर्शिता, बोधगम्‍यता मन के द्वार पर निरन्‍तर आहट देती रहेगी, क्‍योंकि इन कविताओं का जन्‍म करूणा, वेदना-संवेदना, सौन्‍दर्य, पिपासा और संचेतना से हुआ है।
प्रासंगिक उपादानों से संश्लिष्‍ट अनुभूति परक इन रचनाओं में सर्वहारा की देह से बहने वाले पसीने की गंध है। वर्तमान परिप्रेक्ष्‍य में सामयिक सामाजिक कड़ुवाहाट, राजनैतिक दोगलेपन की ध्‍वनि, तो जीवन में हम जो हाहाकार सुनते हैं, उस कोलाहल की साक्ष्‍य है। वहीं इन कविताओं में प्रकृति की गुनगुनाहट, संवेदनशील मानव मन की कोमल भावनाएं यानी इन कविताओं में पीड़ा, संवेदना, आतुरता, विफलता, निश्‍छलता परिभाषित हुई है।
ये कविताएं अपने मूल चरित्र में नितान्‍त ही मौलिकता लिए हुए संवेदना के धरातल पर उगी कितनी प्राणवान है और आम आदमी से कितनी जुड़ पाती है, यह सुधि-पाठकों की कृपा पर आश्रित है।
- कुं.संजय सिंह जादौन
आज पेश है इस संग्रह की पहली रचना--

अतृप्‍त मन

मेरे अन्‍तस में भर दी, माँ ।
तुमने कितनी छवियां अनन्‍त
मेरी आशा को गीत दिया,
गीतों को प्रियतर मीत दिया,
गीतों को स्‍वर देकर तुमने-
रंग दिसे स्‍नेह से दिग्‍–दिगंत।
कालिदास की शकुन्‍तला-सी,
खुजराहो की अमर कला-सी,
चित्रित कर दी तुमने हृदय में-
देकर मुझको जीवन-बअसं।
जीवन में शत-शत आशाएं,
जाग रही है अभिलाषाएं
चाह रहा निश-दिन मन-याचक,
धूप-छांह जिसका नहीं अंत।
बाहों में भर लूं धरा-गगन,
छू लूं प्रकाश की तरल किरण,
सांसों में बजता द्वैत-राग-
त्रिशंकु-सा अधर तन का संत।
सब कुछ पा फिर भी निर्धन है,
कि तृप्ति-अतृप्ति की उलझन है,
अहम को प्‍लवित करता पल-पल,
जिजीविषाओं का यह महंत।
मेरे अन्‍तस में भर दी, माँ ।
तुमने कितनी छवियां अनन्‍त।

Monday, September 10, 2012

स्‍वात्‍म के लिए


पीठ पर
बोझा लादने का अर्थ
गुलामी नहीं,
हमने अपनी पीठ
लिए तुम्‍हें रौंदने को दी है
कि हम भी जिन्‍दा रह सकें
और
तुम आजाद कहला सको,
पीछ से चिपके पेट
कुड़मुड़ाती अंतडि़यां
आंखों में गहराई
काली छाया
मशीनों की गड़गड़ाहट में डूबे
हमारे अवकाश के क्षण
तुम्‍हारी आजादी को
बरकरार रखने के लिए
ऊर्जा देते हैं
जब तुम
स्‍वयं के बिके ईमान की
काली ईटों से निर्मित
अन्‍त:पुर में
किसी खरीदी हुई भूख के साथ
विलासिता में डूबे होते हो,
तब हम
गर्द झाड़ कर
शरीर की हडिड्यों को
दर्द की भट्टी में सुलगाते हुए
जागते हैं
और
दिए की मंन्दिम लौ में
बुझती सी
स्‍वातंत्र्य चेतना को
अपने खून से सींचकर
फिर फिर धधकाते हैं।
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Sunday, September 9, 2012

अनमनी सुबह



कैसे मुस्‍काएं, कौन गीत गाएं?
अनमनी सुबह है, उदास संध्‍याएं।।

हृदय का मधुवन, मन की अमराई,
बदरंग हुई सब, तन की ऋचाएं ।

गमलों से पढ़ते रहे हम मधुमास-
औ’ मौसम की पुस्‍तकी परिभाषाएं।

गंधायित-सौगातें वो बिसर गईं,
गन्‍ध-पांखुरी पर लिखी कविताएं।

दे डाली सब इच्‍छाओं की आहूति,
चुकती जातीं श्‍वासों की समिधाएं।

चुक गए सभी सम्‍मोहनी सम्‍बोधन,
अर्थविहीन हो गई संज्ञाएं।

किस सरिता-जल में निथर आए हम,
दूषित गंगा-जमुना की धाराएं।
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Saturday, September 8, 2012

पत्‍थर के लोग


आती नहीं चेहरे पे लोगों के मन की बात।
पत्‍थ्‍ार के हो गए लोग, अब कहां वो जज्‍बात।।

मिलते भी हैं तो मिलते हैं बेगानों की तरह,
कैसे बहके हैं लोग कि ज्‍यो हों गया सन्निपात।

धुंएं के पर्दे हैं पलकों में कहां खुले वातायन,

न वो शिकवे-शिकायत है न वो प्‍यार की सौगात।



सावन में तरसते है लोग काले बादलों को,

फागुन में बरसती है, यारों! बे-मौसम बरसात।



उजाले की बात करती है निशा ‘’यादवेन्‍द्र’’

कि सूरज को ले के आगोश में सोई है रात।

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Friday, September 7, 2012

आदमी की अस्मिता


टूटे सपन की किर्चियां,
है ये शहर की बस्तियां।

बहरा, प्रदूषित शहर यह,
सुनता न उदास सिसकियां।

इश्तिहार-सा हर शख्‍स,
चेहरों पे हैं तल्खियां।

दिल मिलते नहीं यहां,
मिलती है सिर्फ हथेलियां।

हाथ में ले घूमते यहां-
लोग माचिस की तिलियां।

रेत की हथेली पे धरी -
दफ्तरी कागज की किश्तियां।

आदमी की अस्मिता है,
उधारी चाय की पर्चियां।
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