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Friday, August 10, 2012

टेबुल से टेबुल तक




एक युग 
बीत गया,
शब्‍दों में ही बतियाते,

कर न पाए 
क्षण भर,
मन से 
मन की बातें।

कुलटा फाइलों के 
संसर्ग में,
इसकी उससे करते,
अपना तो कोई 
बोध नहीं
भेड़ चाल से चलते।

खेला किए 
शतरंजी चालें,
टेबुल से टेबुल तक घातें।

लिखते-लिखते 
संकेतों में,
स्‍वयं हो गए संकेत,
रहे हम तो 
मात्र 
निपूती रेत।

खाली नोटशीट,
आंकते हैं ऋण के खाते।
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Thursday, August 9, 2012

टूट कर सूरज से




भीड़ में
खुल सकते नहीं
किवाड़ मन के।

सिर्फ रह जाते हैं कुछ
मौन के पर्दे हिलकर
तारकोली-अधरों पर
पैबन्‍द हंसी के खिलकर।

लयहीन
कलों के शोर में
बोलते हैं सिर्फ, कोण नयन के।

आलपिनों की नोक पर
झुका मिमियाता संवाद
रोज एक ही अर्थ का
बासी शब्‍दानुवाद।

टूट कर सूरज से
कर लेते हैं बन्‍द
मकानों में शव तन के।

ओढ़ कर तिमिर
श्‍वासें किरचों से
दु:ख अपने सी रहीं।

ढंक सकते नहीं
उधार के सृजन से
शरीर निर्वसन के ।
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Wednesday, August 8, 2012

क्षण है श्रृंगार के



मन-विहग गाए,
यह उड़-उड़ जाए,
गन्‍ध जूड़े कसे, महके बयार के।
छू गए कौना-आन्‍तर द्वार के।।

रंगों की फुहार,
रंगों की पुकार,
बरजे क्‍वांरी याद को मन भार के।
कि आई यह उमर, यौवन उभार के।।

बसन्‍ती बोलियां,
फूल की डोलियां,
फागुन-पाहुन गाए गीत प्‍यार के।
शरद्-चिरिया उड़ी, पांखें पसार के।।

पांव लिपटे सपन,
नृत्‍य करते मगन,
शाख-शाख
से पिंकी-स्‍वर मनुहार के।
आए चढ़ कांधे, पवन कहार के।।

गौर रसवन्‍ती,
दुल्हिन जलवन्‍ती,
विरम रही नयन, आंसू संभार के।
पिया न आए यह, क्षण है श्रृंगार के।।
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Tuesday, August 7, 2012

उग आई सुधियां





वसुधा-तल मेंहंदिया गया
ज्‍यों मेहंदी तुम्‍हारे हाथ की ।

दमकें दामिनी जैसे तुम्‍हारे
श्‍यामल कुन्‍तल में
गुंथी स्‍वर्ण-डोर,
तोड़ अधरों के अनुबन्‍ध
बिखर गई रिमझिम-सी
तुम्‍हारी हंसी चहुं ओर।

दूर्वा सी उग आई सुधियां
प्रथम-प्रणय सौगात की।

पुरवा की ताल पर
नाचे फुहारें, नाचती ज्‍यों
तुम झूम-झूम घूमर,
टूट-टूट नभ से
छुमकती आंगन में बूंदें
ज्‍यों पांवों के नूपुर।

ऐसे में मदिरा भी क्‍या,
मादक है ऋतु बरसात की।
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Monday, August 6, 2012

कोई मीत न रूठे




ओ मेरे हमजोली,
खेलें ऑंख मिचौली।

सुधियों के पार चलें,
फागन के गले मिलें,
पल-पल मुस्‍कानों के
होठों पर समुन खिलें।

साथ साथ रंग भरें
सजी है रंगोली।
महके गजरे महके,
खनके कंगन खनके,
मदमाते से चंचल
बहके से दृग बहके।

कुहुक उठी कोयलिया,
मन में मिसरी घोली।
दृगों के तीर छूठे,
अनबोले घट फूटे,
भीगे-भीगे क्षण है
कोई मीत न रूठे।

अबीर गुलाल खेलें,
रंगों की है होली।
ओ मेरे हमलोजी
खेलें आंख मिलचोली।
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Sunday, August 5, 2012

सपनों को दे भाषा





तुम आओ तो 
दोनों सपनों को भाषा,
दें अर्थ नए-नए गीत को।

कंचनवर्णी देह-गन्‍ध को,
अपनढ़े पायल के छन्‍द को,
दें अर्थ नए-नए गीत को।

अरुणाए अधरों पर पनघट-
उमसती अनचाही प्‍यास को,
पहना दें स्‍वाति बुंदकियां हम-
चूंम लें झुकते आकाश को,
तुम आओ तो
लगे गाने अधर की पिपासा,
दें मधुर हास पर्ण-पीत को,
सावन हरा गर्द-गुबार को,
दें नव प्राण सूखी डाल को,
सावनी फूलों की रीत को।

हरियायें साध की फगुनियां,
पुलक उठे केसर पराग से,
मुखर हो गुन-गुन गुनगुनाए
बोझिल चुप्पियां अनुराग से,
तु आओ तो
गूंगी यह अभिलाषा,
चाह रही सौपान मीत को,
उन्‍माद भर सजल श्रृंगार को
औ’ कजली मेघ-मल्‍हार को,
कि चाहती व्‍याहना प्रीत को।
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Saturday, August 4, 2012

बादलों के शामियाने




धरती पर बिछ गए हैं,
दूब के हरे गलीचे,
तन गए आकाश में, बादलों के शामियाने।

पांव में
मौसम के बूंदों की पायल बजती,
छांव में
प्रीत बावरी, कि पिव-पिव पुकारती।

तन-मन-प्राण हरियाये,
ये यादों के बागीचे,
धर गई पुरवाई इक गीला, छन्‍द सिरहाने।

गांव में
यहां डाल पर गदराये कच्‍चे आम,
नाँव में
अधरों की, आ बैठ जाता एक नाम।

क्षुधा-सांवरी यह भरे
कलश उरोजों पे सींचे,
आसाढ़ क्‍वांरे घन, छज्‍जों पर लगे उतराने।
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