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Wednesday, August 1, 2012

यह बदली



यह बदली
न जाने कहां पी आई पगली।

ठहरते न पांव कि शोर मचाए,
द्वार-खिड़कियों पे थाप लगाए,
यह बदली
झूम-झूम गाए कजली।

बरबस गहती मुझको बांह में,
औ’’ भीगे आंचल की छांह में,
यह बदली
जैसे कि तार बुनती हो तकली।

होठों तक आती मन की बातें,
दूब-सी उग आई सौगातें,
यह पगली
भेद मन के खोल गई बिजली।

यह बदली
न जाने कहां पी आई पगली।
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Tuesday, July 31, 2012

सूर्यमुखी हँसी

रूप का दीप जला
प्राण ! तुमने घर आंगन उजियार दिया।

आई नूपुर बांध पांव में,
ज्‍यों बिजली प्रतीक्षित गांव में,
जूड़े गूंथ उजले -
फूल कांस के, सुधियों ने श्रृंगार किया ।

घर आया ज्‍यों क्‍वार का धान,
ऐसी तुम्‍हारी मुस्‍कान,
दुहरा नयन- काजल,
आधी रात, दर्पण ने मनुहार दिया ।

उजलाई गहरी छायाएं,
टूटी ताड़ सी प्रतीक्षाएं,
सूर्यमुखी हंसी ने,
धुंधली रेखाओं को आकार दिया।

रूप का दीप जला
प्राण ! तुम ने घर-आंगन उजियार दिया
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Monday, July 30, 2012

बुला गए बदरा



बिखर या कजरा,
लुभा गए बदरा।

छत पर खड़ी निखारती रही डगरिया,
तुम न आए पिया, थक गई नजरिया ।

बहा गए बदरा,
पलकों का कजरा ।

सकुच सकुच खोली गीली कंचुकिया,
इतने में मुसकाई शोख बिजुरिया ।

दहक गए बदरा,
अंग अंग पियरा ।

कि बैरिन बयार खुड़काए कि‍वडि़या,
आहट पर उचट उचट जाए निंदिया ।

पहिनाए बदरा,
मोती का गजरा ।

डसती एकाकी सावन की रतियां,
आओ बतियायें हम मन की बतियां ।

उमड़ उमड़ गहरा,
बुला गए बदरा ।

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Sunday, July 29, 2012

तुम मिले ऐसे.....



तुम मिले ऐसे
द्वार पर जैसे कि वीरान हवेली के,
खिल गए हों सुमन महकती चमेली के ।
मिल गई गन्‍ध जैसे भटकते पवन को,
देव दर्शन मिला हो कि मेरे नयन को।

तुम मिले ऐसे
हो गई एक देह चूनर रंग बसंती,
रच गए गहरे रंग प्रणय हथेली के ।

आकाश को मिल गई पूनम क्‍वार की
लगी बजने वीणा मधुर मनुहार की ।
तुम मिले ऐसे
छन्‍द से उतरे कि गीत पूर्ण हो गया,
खुल गए अर्थ अबूझ तरूण पहेली के ।
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Saturday, July 28, 2012

तुम्‍हारी श्‍यामल अलकों ने...



जैसे तुम्‍हारी,
श्‍यामल अलकों ने,
तान दिया पाल, छत पर आकाश के।

झर रहे कि शब्‍द
बूंद-बूंद गीत के,
उभर रहे अर्थ
दूर्वा से प्रीत के,
शरमीली नत श्‍याम-
नील पलकों में,
झूल रहे प्रतिबिंब, आकुल प्‍यास के ।

फूल रही कि
माटी में साधनाएं,
नाचते मोरों-सी
ठुमकें कामनाएं,
जुड़ रहे सन्‍दर्भ
कि नभ से धरा के
ठहरते न पांव भीगी, वातास के ।

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Friday, July 27, 2012

तपन दे गए उषा के चन्‍दन-क्षण

दृष्टि-पन्‍थ से
हो गए ओझल, तुम्‍हारे चरण ।

भर गई चिकोटी निगोड़ी भोर,
भीग गई कजरारी नयन कोर,
पलकां में बन्‍द धीरज छूट गया,
सुधियों का सन्‍दर्भ टूट गया ।
फैंक किरण-शर
दिग्-दिगन्‍त से
दरक दिए सब, सपवनों के दर्पण,
दृष्टि-पन्‍थ से
हो गए ओझल, तुम्‍हारे चरण।

बिसर गए पूजा के नेम-नियम,
टूट गया चुप शब्‍दों का संयम,
कीलित मर्यादाएं हिल गईं,
छाल पपड़ाए घाव की छिल गई ।
बन्‍ध्‍या कोख
दूर कन्‍त से
तपन दे गए,
उषा के चन्‍दन-क्षण,
द़ष्टि पन्‍थ से
हो गए ओझल, तुम्‍हारे चरण।
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