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Tuesday, October 16, 2012

सहमे हुए व़क्ष



वृक्ष
सहमे हुए हैं
कुल्‍हाडि़यों के डर से।
खुद
अपनी ही ज्‍वाला में
जल रहे हैं
पलाश,
बीमार है
पीलिया से
अमलतास,
शहतूती अहसास
चूक गए
गांव शहर से।
गीतों में
कहां अब वो
उल्‍हास,
फूलों के गांव
फागुन
बहुत है उदास,
पीडि़त है मानवता
हवाओं से
घुले जहर से।
उतर गए रंग
छूते ही
तितलियों के पांखों के,
पाला मारते ही सरसों
टूट गए
क्‍वांरे स्‍वप्‍न आंखों के,
आते-आते
लौट गईं खुशियां
गरीब के घर से।
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Monday, October 15, 2012

हलधर




वह आदमी
जो
हल कांधे पर धरे
बैलों की रास थामे
अक्षरों से अनभिज्ञ
अक्षरों से शब्‍दों के रिश्‍तों
और
उनकी ध्‍वनि से भी अनजान है
किन्‍त वह कभी कोसता नहीं
पृथ्‍वी, सूर्य, मिट्टी-जल, आकश को
इन्‍हें टुकड़ों में भी नहीं बांटता
वह तो
इन्‍हें जोड़ कर
संचित करता है
जीवन-शक्ति
अपने भीतर
शक्ति से
जन्‍म देता है परिश्रम को
और
श्रम-बिन्‍दुओं को बाता है
मिट्टी में
फिर हल की कलम से
लिखता है कविता।
जो अस्‍त्र बन
राष्‍ट्र की अस्मिता के लिए
संघर्षों से
जूझना सिखाती है,
कविता
वह जो फसल-सी
लहलहा कर
भूख से लड़ती है।

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Sunday, October 14, 2012

तीन क्षणिकाएं

समाजवाद.....

उनको मुटा गया सुख

आ गया

कुर्सियों का स्‍वाद,

इसलिए उन्‍होंने

अपनों में बांट लिया समाजवाद।

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चतुर बन्‍दे.....

बिना किस श्रम

खोले आश्रम

मांग-मांग कर चन्‍दे

बड़े हो गए

बापू के बन्‍दे।

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अभाव.....

चीलों से मंडराते लोग

मारते हैं छापे

गांव-गांव

रोटी की तलाश में

हर मुंडेर पर

करता है कौआ

कांव-कांव।

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Saturday, October 13, 2012

रेत का घर



तुतलाते सपने
मासूम आंखों से
आंसू बन ढुलक गए,
मोतिया-बिन्‍द बन उतर आए
जो भी था अपना
चुटकी भर सुख,
सब डूब गया धुंध में
तलाशते स्‍वयं को
थक गया, हार गया

मैं

नन्‍हें पांवों से

बुढि़याते पांवों की यात्रा तक

बनाते-बनाते रेत का घर।

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Friday, October 12, 2012

भेड़ की नियति



भेड़ें
मरुस्‍थल/रेत की/भूख/प्‍यास
पीठ पर/लादे
कांधे पर लाठी धरे
हांकते
गढ़रिए के डर्र-डर्र
इशारों पर
पठारों/कंकरीले मैदानों के पार
नपीची गरदनें किए
सूंघती/घास/पानी की गंध को
चलती जाती है
रेवड़-दर-रेवड़
गरदनें झुकाए
धरती की नमकीनआग चाटते
डंठलों को चबाते
जितने दूर चले जाते हैं
उतनी ही दूर हाती जाती है
उनसे
पानी/हरी घास की तलाश
उनके मिमियाने/आपस में सींग उलझाने से
कोई फर्क नहीं पड़ता
गड़रिए को
वह
किसी नेता की तरह
माईक पर ध्‍यान आकर्षित करने की
मुद्रा में
लाठी की ठक्-ठक् कर
हांक लगा
भेड़ों को
बबूल की/गंजी छांव तले
इकट्ठा कर लेता है
अपनी
भूख/प्‍यास के लिए दुहाता है
दूध/भेड़ों का
बेच लेता है कसाई को
भेड़े
गड़रिए को
पीठ पर लदी/पोटली
पानी की छागल से
रोटी खाते/पानी पीते
ठंडी नज़रों से/टुकर-टुकर देखती है
और
चुपचाप/अपनी नियति पर
गरदनें लटकाए
जुकाली करती रहती है
कि
भेड़ पर कोई नहीं छोड़ता
ऊन।
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Thursday, October 11, 2012

माटी का संगीत


गांव-गांव में
खेतों-खलिहानों में
कड़ी धूप में
स्‍वेद बह रहा,
समता की पट्टी पर
मेहनत की कलमों से
लिखी जा रही
श्रम की गीता।
जन-जीवन की खुशहाली
फिर उतर रही
ले नई योजना
जीवन के
उजले यथार्थ पर।
और कहीं पर
सत्‍यका मोहन
वेणु लेर
मेड़ों पर गा रहा
गीत फसल के,
जिनको सुनकर
नाच रही
फसलों की राधा।
बासन्‍ती परिधान पहनकर
मलयज बजा रहा है ताली
माटी का
संगीत नया है।

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Wednesday, October 10, 2012

बीते सावन की यादें


गर्मी से झुलसे
वन-पर्वत हुलसे
जल की लिए छागल
पहाड़ी के पार जो दिखा बादल।
ग्रीष्‍म से तपते
द्रुम-लता
पात-पात का कर चुम्‍बन,
सूत कातती
तकली-सी नाचती बदली
लायी प्रणय का निमंत्रण;
आया आषाढ़
नहाया पहाड़
भीज गया भीतर-बाहर
छुमकी जो बूंदी की पायल।
अकेले में
बिजली की देह

कर जाती मन खराब

चिहुंक-चिहुंक उठता

कामातुर

जलपांखी मेघ पीकर शराब;

गाती कजरी

पगली बादरी

बीते सावन की यादों में

सिसकता है बूढ़ा जंगल

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