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Friday, July 13, 2012

पानी से जुड़ें



तुमने
देखा होगा
तूफानी हवा के साथ
उतुंग लहरों का
तटों से टकराना,
सागर को खंगालना,
जैसे
टुकड़े-टुकड़े कर देंगी
सागर को,
पर क्‍या
पानी से जुड़े
गहरे
अन्‍तरंग-मन
सागर को
बांट पाई है
ये लहरें ?
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Thursday, July 12, 2012

शून्‍य में लटका देश



बूढ़ी होती नसों में
जीने की आकांक्षा
प्रेत बन कर
धरती और आकाश के बीच
भटक रही है
और जवान नसों में खौलता खून
मुट्ठियों में
भींच लेना चाहता है
मानसून।
दो ध्रुवों के संघर्ष का
क्‍या हो परिणाम
कोई नहीं जानता,
हर कोई
हवाओं में मुट्ठियों तान-तान कर
बन जाना चाहता है इतिहास,
इनमें से
कोई नहीं चाहता
अपनी-अपनी पीक के निशानों पर
पराजय के झण्‍डे गाड़ना।
गर्म तपती रेत पर
नंगे बदन
छालों को सहेजता देश
शून्‍य में लटका है,
ऐसे में
कौन, कैसे करे
स्‍वतंत्रता का आन्‍दोलन ?
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Wednesday, July 11, 2012

फिजूल तेरा दु:खी होना

फिजूल
तेरा दु:खी होना
कि शरीर से
एक-एक बूंद खून निचोड़ कर
पैदा की फसलें,
भूख से
पपड़ाए होठों पर
चुटकी भर
बसन्‍ती-धूप नहीं धर पाई।
फिजूल
तेरा पछताना
कि क्‍यों
फबुनाए साहूकार की
मक्‍कार मुस्‍कान के
स्‍वर्ण-मारीची आश्‍वासन में
तू
सिर झुकाए
सलाम में
कमान होता गया।
फिजूल
तेरा सोचना
कि मोटी खाल वाले
ये शिखंडी
तेरे सूखे ठूंठ को
दिल्‍ली से खून ला कर
सरसब्‍ज कर पाएंगे ?

बन्‍धु रे !
रीढ़ की हड्डी सीधी कर
'तंत्र' को 'लोक' का अर्थ समझा,
तब कहीं
तेरा पुरुषार्थ
सार्थक होगा।
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Tuesday, July 10, 2012

मिट्टी की आत्‍मीयता

वृक्ष
जिसकी
जड़ों में गुंथी है आत्‍मीयता
अपनी मिट्टी से।
मिट्टी से लेता है खुराक
खुराक से तना होता है पुष्‍ट
फलता है, फूलता है,
फूल-पत्तियों के
रूप-रंग-रस-गंध
बन जाते हैं एक संस्‍कृति।

फल
होता है एक शाश्‍वत कलाकृति,
और
मिट्टी से जब वृक्ष की
हो जाती है समाप्‍त
आत्‍मीयता
तो वृक्ष
वृक्ष कहां रह पाता है ?
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Monday, July 9, 2012

सड़क की तलाश

पहाड़ से उतर
पगडंडी
गांव से शहर तक जाते-जाते
सड़क बन गई।
शहर की शुभ्रोज्‍ज्‍वल
ऊँचाइयों की
अंधेरी तलहटी में
महसूस किया
कि वह सड़क
जो मुझे और तुम्‍हें
मंजिल तक ले जाती है
हमारे भीतर ही
कहीं गुम हो गई है।

अब
हम-तुम
न उसे सड़क ही कह सकते हैं
और न पगडंडी ही,
जो कुछ भी
हमारी अन्‍तरंगता हो सकती थी
वह हम पीछे छोड़ आए
और हर कोई
लड़ रहा है
पहाड़ से।
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Sunday, July 8, 2012

आशा का बसन्‍त



आशा
मेरी जीवन सहचरी है
जो मुस्‍कान बन कर
मेरे ही अधरों पर नहीं
कृषक-बाला की
सहज उभरती तरुणाई-सी
बालियों में भी अंगड़ाई लेती है।
विश्‍वास मेरी
प्रियतमा के
पलकों की प्‍याली का
अमृत है
जिसकी छलकती हुई बूंदों के
इन्‍द्रधनुष
सूरज से भी आंख मिचौली खेलते हैं।
प्रीति और करुणा
मेरी प्रेयसी की
मदभरी आंखें हैं
जिनमें
अवसादों के मेघ घिर-घिर कर
तप्‍त हृदयों पर
दिलासा की झड़ी लगाते हैं।
घृणा और असत्‍यता
मेरी रानी की
दो-दो दासियां हैं
जो चरण चम्‍पी की गंगा में
अपने कालेपन को धोकर
कृपा को पात्र
बनना चाहती है।

मेरा भोग
बदलों की
रिमझिम के संगीत के साथ
नाचती-गाती फसल की
हरी जवानी का
छलकता आँसू है
जो
किसान की आँख में बसा है,
मेरा यौवन

आशा का बसन्‍त है।

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