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Friday, June 15, 2012

ऊँ... शान्ति....

सिर कनपटियों के
सफेद बालों पर लगा कर खिजाब
करते हैं देखने का प्रयास
बैसाखियों के उस पार
दूर छूटे ख्‍वाब,
बहुत चाहते हैं झुंठलाना
बोनी दुनिया के
बुढ़ापे को
छू पाना
मगर
संशयों की जुगाली करते
देखते हैं आगत को,
बंदरी की तरह सीने से चिपकाए हैं
मृत बच्‍चे से विगत को,
मूक-बधिर से बोलने की छटपटाहट में
कोसते हैं वर्तमान को,
मोतियाई-दृष्टियां
देख नहीं पाती स्‍वच्‍छ दिनमान को
और
निहारते ही अल्‍हड़-यौवना को
असमय
तोड़ते हैं तिलस्‍मी रहस्‍य,
पपड़ाए होठों की
वीरना डयोड़ी पर
ऊंघते शब्‍द लड़खड़ाते हैं
ऊँ शांन्ति...........।
ऊँ शांन्ति...........।
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Thursday, June 14, 2012

वहशीपन


रात के अंधेरे में
उग आए
नाखून,
चेहरे पर
वहशीपन को
हर दिन
पर्दे के सामने आने से पूर्व
सूरज के आइने में
खुरचते, काटते हैं;
क्‍योंकि
जानते हुए भी
हम
एक दूसरे के सत्‍य को
नहीं चाहते उजागर करना।
पहिनाते हैं वस्‍त्र
लगाते हैं उबटन खींचकर बलात
खड़ी करते हैं
होंठों के काउन्‍टर पर
सेल्‍सगर्ल की मुसकान,
जो करती है,
हर सामने वाले का स्‍वागत।
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Wednesday, June 13, 2012

''मैं''


5.
कितनी छोटी है अंगुलियां,
छोटी है
परन्‍तु
सशरीर से जुड़ा
आदमी कितना बड़ा
जिन पर है खड़ा।
बात तो यह है अचरज की
आदमी हुआ है छोटे से बड़ा
फिर भी रहता है
छोटों से
हरदम अकड़ा,
''मैं'' के
सर्पपाश में है
जकड़ा आदमी
है कितना बुद्धि का लंगड़ा।
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Tuesday, June 12, 2012

1


1.
शिष्‍ट आचरण...........?
नेताई भाषण।
शराफत...........?
कटी हुई सही इबारत।
एक कप चाय...........?
क्‍लर्की हमदर्दी।
2.
आयोगों का
कर के गठन
कर रहे हैं खोज
समस्‍या के समाधान की
किसी अन्‍य पर डाल
अपनी हकर्मण्‍यता और असफलता का बोझ।
3.
नए दल बदल
बदरंगी नारों के
पुलिन्‍दें सौंप
भीड़ को उत्‍तेजित कर
करते आए हैं
हम
स्‍वतंत्रता का सदुपयोग।
4.
कमरे के बगल वाले अमरूद के पेड़ पर से
नन्‍ही-नन्‍ही चिड़ि‍यां
लगी पढ़ने विज्ञापन
चस्‍पा करता नोटिस
शीतल पवन
जागो
धरती पर उतरने वाली है
सूर्य-किरन
आओ
धो लें मिमिर-मन।
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Sunday, June 10, 2012

कोई एक कुर्सी के लिए

कोई एक कुर्सी के लिए
सौंप देता मैं
अगर, स्‍वयं अंधेरों को।

बन्‍द कर लिफाफे में
चरित्र को भेज देता कहीं दूर
पत्‍नी की मांग में भरता
किसी और नाम का सिन्‍दूर।

सच ,
कोई एक कुर्सी पा ही जाता
अगर,
मुँह मोड़ कर हो जाता खड़ा
देखकर उतरते सेवेरों को।

औढ़ आयातित मुस्‍कान
साथ ले साकी ओ जाम
पर्दों के पीछे बन्‍द कक्षों में
होती हर रंगीन शाम।

सिर्फ
उनके एक सुख के लिए
कहता गुलाब अगर कनेरों को ।

सच,
कोई एक कुर्सी पा ही जाता
सौंप देता मैं
अगर, स्‍वयं अंधेरों को।

Friday, June 8, 2012

स्‍वार्थों के बरगद

कुर्सियों से चिपके लोगों के
हाथों गढ़वाते रहें कीलें
हडि्डयों की देह पर
कब तक हम
यातना सहते रहें ?
चर कर पीढ़‍यिों का सुख
स्‍वार्थों के बरगद तले
कर रहे जो शाब्दिक जुगाली,
भला कहां है
देखने को आंखें
उनके सिर्फ दो कोड़ियां हैं
जो देख सके हमारी बेहाली
बाज के शिकंजों में है
इच्‍छाओं के कपोत,
कब तक हम
मुक्ति की वंचना सहते रहें ?
मुर्गे की बांग भोर के आने का वह़म है,
सच तो यह है कि धुँए में
डूबा है सारा आकाश,
चालाक लोमड़ियां
शहर की सड़कों पर घूमती है
उजले वस्‍त्रों में
और समय पाते ही
खा जाती है किसी का विश्‍वास,
कितनी ही उजली भोर की
क्‍वांरी किरण को निगल गए
ये, गुनाह के अँधेरे
आखिर कब तक
किसी कुछ की
सांत्‍वना सहते रहे ?
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Thursday, June 7, 2012

उगते आस्‍था के फूल

बूढ़े, लंगड़े,
बौंडे, खूंटे छोड़े
जर्दिया पान की पीक से
बदुआते
आदर्श-
दांत खिसियाते हैं;
धुंआती अफवाहें
सठियाये संशय
कीलते हैं
मेरी राहों को,
चुगल-खोर हवाओं की
फसफुसाहटें
नोंचती है
मेरे युवा मस्तिष्‍क को;
तब उदास निगाहों को
टांक देता हूँ
आश्‍वस्‍त होने को
तुम्‍हारे रेशमी-बालों पर
और
तुम्‍हारे होठों पर
उगते आस्‍था के फूल
प्रेरणा देते हैं
मुझे
विश्‍वास के देवदार पर
चढ़ने की
आकाश की ऊँचाइयों को
नापने की।
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