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Saturday, November 10, 2012

फाल्‍गुनी बयार में



हल्दिया सरसों लहके, फाल्‍गुनी बयार में।
वन-उपवन, खेत गमके, फाल्‍गुनी बयार में।।

रंग-बिरंगा आज फिर हुआ मन का मधुबन,
धूलि चंदन-सीर महके, फाल्‍गुनी बयार में।

अनायास ही जग उठी, अन्‍तस में लालसा,
लाल टेसू जब दहके, फाल्‍गुनी बयार में।

बांध सुमनों की वेणी, पहने सन-बिच्छिया,
ग्राम्‍य यौवना ठुमके, फाल्‍गुनी बयार में।

आए दिन उमंगों के, गणगौर पूजन के,
कि रूप प्रिया का दमके, फाल्‍गुनी बयार में।

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Friday, November 9, 2012

मरु के गांव


फिर गुल खिला रहे चुनाव, मरु के गांव।
रेत में जैसे धंसे नाव, मरु कि बोव।।
अक्षरों की भाषा से बेखबर आदमी,
जी रहे भूख और अभाव, मरु के गांव।
इस ढाणी से उस ढाणी तक, यहां-वहां,
धूप ही धूप है न छांव, मरु के गांव।
रेत ही रेत पसरी हुई आँखों में,
प्‍यासे कुएं-खेत कर रहे सायं-सायं,
अब ताक हर तरु भटकाव, मरु के गांव।
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Thursday, November 8, 2012

क्‍यों दूरियों का पुल




मन आज बहुत विकल, प्राण! सुन-सुन कल-कल।
पास इतने फिर भी, क्‍यों दूरियों का पुल ?
सुर्ख रुखसारों पे, खिले ये लाल कमल,
विहंसते कजरारे नटखट नयन चंचल।

झंकृत जल तरंग लख उन्‍नत श्रीफल,

चढ़ा नशा जाए न उतर रूप का जल। 

श्‍वासों का कपूर, प्रिये! उड़ रहा पल-पल, 
मुहूर्त प्‍यार का जाए न कहीं टल। 
फिर फिर झुमकाओं रूनझुन-रूनझुन पायल,
रहें या न रहें हम रहेगी प्रणय-ग़ज़ल।
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Wednesday, November 7, 2012

ग़ज़ल



होठों पर एक रेतीली प्‍यास लिए हुए
जी रहे हाथ में खाली गिलास लिए हुए
शूं-शूं करते शहरी नल पर बैठी ''चिडि़या''
दिन भर से एक बूंद की आस लिए हुए
डूबे हैं जहरीली हवा में शहर-बस्‍ती
बसते हैं यहां बीमार अहसास लिए हुए
इस कदर गरम हैं, यारों! मौसम का मिज़ाज
शाख़-शाख़ नंगी, झुलसा मधुमास लिए हुए

कांच का घर जिन्‍दगी, यहां पत्‍थर हुए लोग

बातों में बघनखे या संत्रास लिए हुए।

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Friday, November 2, 2012

ग़ज़ल


आंखें में मेरी तुम जो झांक कर देखोगे।
एक पसरा हुआ रेतीला डर देखोगे।।
पिंजरों में बन्‍द तोते रटते राम नाम,
बहुत खूबसूरत, मगर कटे 'पर' देखोगे।
ले के ख्‍वाहिश जिधर भी सड़क पे निकलोगे,
जला हुआ, धुंए में डूबा शहर देखोगे।
किसके रंगे नहीं हाथ आदमी के खूं से,
जिधर देखोगे हाथ में खन्‍जर देखोगे।
धूल से यूं धुंधला गए बिम्‍ब दर्पणों के,
कि होठों पे फूल की हंसी किधर देखोगे।
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Thursday, November 1, 2012

विधवा इच्‍छाएं



सांप लिपटे है चन्‍दन क्‍या देखें।

आंसू भरे नयन से गगन क्‍या देखें।।

चेहरे पे चिपकी हैं उदासियां,

दरका हुआ मन, दर्पण क्‍या देखें।

सूरज ही जब हो तिमिर के घर रहन,

मुफ़लिसी में सहर की किरन क्‍या देखें।

फूल भी है, खुशबू भी सेज पे-

आंख लगती नहीं स्‍वप्‍न क्‍या देखें।

शे रही सिर्फ विधवा इच्‍छाएं,

टूटे पड़े सुहाग, कंगन क्‍या देखें।

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Wednesday, October 31, 2012

खुशियों से ज्‍यादा ग़म



रूप थी, यौप भी, दिल न था उठा के नकाब जो देखा।

और ज्‍यादा चुभे कांटे, छू के टीनी गुलाब जो देखा।।

मौसम की बदगुमानी तो देखो, घाव फिर हरे हो गए,

कि फूल सूखे ही मिले, हमने खोल के किताब जो देखा।

बाद मुद्दत के नींद आई थी, यह तो किस्‍मत की बात है,

आंख कब लगती नहीं किसी तरह कल से ख्‍वाज जो देखा।

दोस्‍त भी थे, वफा भी थी और वे कुछ हम सफर भी साथ,

किनारा कर गए वो सभी, दर्द का सैलाब जो देखा।

करते रहे ता उम्र हम जिन्‍दगी और आंसुओं से सुलह,

खुशियों से ज्‍यादा ग़म मिले हमने उम्र का हिसाब जो देखा।

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