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Monday, October 29, 2012

इन्‍हीं के घर रहन मेरी उम्र की शाम है



इन्‍हीं के घर रहन मेरी उम्र की शाम है
मेरी सिसकती शेष खुशियों के ग्राम है,
कुर्सियों से चिपके लोगों के नाम हैं।
बैसाखियों पर चढ़ जो हो गए हैं हुजूर,
सभी को मुझ बौने का बा-अदब सलाम है।
रोशनी के नाम पर अंधेरे बांट रहे,
इनकी जेबों में बन्‍द सुबह की घाम है।
कल तक के हम-सफर आज हो गए खजूर,
इनके कटे-साये में जिन्‍दगी तमाम है।
कागज-सा दिन छेद दिया आलपिनों से,
इन्‍हीं के घर रहन मेरी उम्र की शाम है।

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Monday, October 22, 2012

फ़ुज़ुल चेहरा



दफ्तर जाते, था फूल सा चेहरा।
लौटे तो, था धूल सा चेहरा।।
टेबिल से टेबिल तक मात सही,
प्रारूप की, था भूल सा चेहरा।
खेल सका न गांठ लगा फीता,
अफ़सर को, था कब क़बूल चेहरा?
न लेने में था न देने में यह
अपना तो था, उसूल चेहरा।
मुन्‍शीगिरी से थे हम अनाड़ी
इसीलिए था फ़ुज़ुल चेहरा।
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Sunday, October 21, 2012

कोई बात तो हो


ऐसे में कैसे करें बात, कोई बात तो हो।
बीते तो कैसे बीते रात, कोई बात तो हो।।
उमस भरी गुमसुम-सी ठहरी कहीं हवा है,
लरजे तो सही कि पीपल-पात, कोई बात तो हो।
दूरियां भी नाप लेंगे हम डगमगाते पांव से,
अधर हो धरी यदि सौगात, कोई बात तो हो।
आंसुओं से करलें हम सुलह भी यदि हाथ में हो-
किसी के मेहन्‍दी वाले हाथ, कोई बात तो हो।
बादल हो या बहकाहुआ शराबी-सा मौसम हो,
रिमझिम सरगम हो कि बरसात, कोई बात तो हो।
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Saturday, October 20, 2012

गुम हंसी के झरने हुए




चुटकी भर प्‍यार दे कोई
ऐसे लोग कब अपने हुए,
दर्द की धूप लगी उड़ गए
ओस के मानिट सपने हुए।
दिखते हैं जो अभिजात्‍य
बंगलों में रूरी तो नहीं
सच्‍चे सोने-से हों लोग-
आजकल पीतल के गहने हुए।
दोस्‍त बन सकते नहीं ये
लपक के हाथ मिलाने वाले,
पूछते हैं जो हाल, यही
कल रात थे वहशी बने हुए।
'रसखान' के कान्‍हा की
'सूर' के मोहन से रुसवाई,
बांसुरी गूंजे न सन्‍तूर की झंकार
दोनों है तने हुए।
वो ललक, वो उल्‍हास,
वो नभ को छूते सावन के झूले,
कहां वो महकते फागुन के दिन
गुम हंसी के झरने हुए।
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Friday, October 19, 2012

दीप


रात भर दीप जलता रहा।
अंधेरे से लड़ता रहा।।
वृत्तियों के गहन तिमिर में,
मृत्तिका-प्रकाश पलता रहा।
चित्र लिखित निहारिकाओं की-
पंखुडि़यों से नभ सजता रहा।
कज़ली-निशा के अंक में,
प्रणय का पुंज खिलता रहा।
रूप यौवन के दर्पण में,
सौ-सौ बार संवरता रहा।
घर-द्वार दीपावलियों से-
जगमग-जगमग करता रहा।
ज्‍योति के सुमन झरते रहे
पुलक से मनुज पुलकता रहा।
आंधियां सर पटकती रही
भोर तक दीप जलता रहा।
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Thursday, October 18, 2012

ग़ज़ल


बदले में लोग क्‍या देते हैं?
आग को सिर्फ हवा देते हैं।
दोस्‍ती का दम भरते हैं जो,
बीच सफ़र में दग़ा देते हैं।
जलती है आज भी सीताएं,
लोग कैसी दुआ देते हैं?
खा के बीमार मर जाते हैं
हकीम कैसी दवा देते हैं?
आरती के दीप बन जले हम,
बुत किस जुर्म की सजा देते हैं?
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Wednesday, October 17, 2012

ग़ज़ल



वो इतने कमनज़र न होंगे।
जो गहरे समन्‍द होंगे।।
मजलूमों के खूं से रंगे
देखने ये मन्‍जर होंगे?
सह पाएंगे ना तूफान,
जो भी रेत के घर होंगे।
जिनका खूं पानी हो गया,
इतिहास में वो किधर होंगे? 
जिएं जो मुफलिसों के लिए, 
वो ही दिलों के सदर होंगे।

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