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Monday, September 10, 2012

स्‍वात्‍म के लिए


पीठ पर
बोझा लादने का अर्थ
गुलामी नहीं,
हमने अपनी पीठ
लिए तुम्‍हें रौंदने को दी है
कि हम भी जिन्‍दा रह सकें
और
तुम आजाद कहला सको,
पीछ से चिपके पेट
कुड़मुड़ाती अंतडि़यां
आंखों में गहराई
काली छाया
मशीनों की गड़गड़ाहट में डूबे
हमारे अवकाश के क्षण
तुम्‍हारी आजादी को
बरकरार रखने के लिए
ऊर्जा देते हैं
जब तुम
स्‍वयं के बिके ईमान की
काली ईटों से निर्मित
अन्‍त:पुर में
किसी खरीदी हुई भूख के साथ
विलासिता में डूबे होते हो,
तब हम
गर्द झाड़ कर
शरीर की हडिड्यों को
दर्द की भट्टी में सुलगाते हुए
जागते हैं
और
दिए की मंन्दिम लौ में
बुझती सी
स्‍वातंत्र्य चेतना को
अपने खून से सींचकर
फिर फिर धधकाते हैं।
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Sunday, September 9, 2012

अनमनी सुबह



कैसे मुस्‍काएं, कौन गीत गाएं?
अनमनी सुबह है, उदास संध्‍याएं।।

हृदय का मधुवन, मन की अमराई,
बदरंग हुई सब, तन की ऋचाएं ।

गमलों से पढ़ते रहे हम मधुमास-
औ’ मौसम की पुस्‍तकी परिभाषाएं।

गंधायित-सौगातें वो बिसर गईं,
गन्‍ध-पांखुरी पर लिखी कविताएं।

दे डाली सब इच्‍छाओं की आहूति,
चुकती जातीं श्‍वासों की समिधाएं।

चुक गए सभी सम्‍मोहनी सम्‍बोधन,
अर्थविहीन हो गई संज्ञाएं।

किस सरिता-जल में निथर आए हम,
दूषित गंगा-जमुना की धाराएं।
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Saturday, September 8, 2012

पत्‍थर के लोग


आती नहीं चेहरे पे लोगों के मन की बात।
पत्‍थ्‍ार के हो गए लोग, अब कहां वो जज्‍बात।।

मिलते भी हैं तो मिलते हैं बेगानों की तरह,
कैसे बहके हैं लोग कि ज्‍यो हों गया सन्निपात।

धुंएं के पर्दे हैं पलकों में कहां खुले वातायन,

न वो शिकवे-शिकायत है न वो प्‍यार की सौगात।



सावन में तरसते है लोग काले बादलों को,

फागुन में बरसती है, यारों! बे-मौसम बरसात।



उजाले की बात करती है निशा ‘’यादवेन्‍द्र’’

कि सूरज को ले के आगोश में सोई है रात।

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Friday, September 7, 2012

आदमी की अस्मिता


टूटे सपन की किर्चियां,
है ये शहर की बस्तियां।

बहरा, प्रदूषित शहर यह,
सुनता न उदास सिसकियां।

इश्तिहार-सा हर शख्‍स,
चेहरों पे हैं तल्खियां।

दिल मिलते नहीं यहां,
मिलती है सिर्फ हथेलियां।

हाथ में ले घूमते यहां-
लोग माचिस की तिलियां।

रेत की हथेली पे धरी -
दफ्तरी कागज की किश्तियां।

आदमी की अस्मिता है,
उधारी चाय की पर्चियां।
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Thursday, September 6, 2012

थरथराती जिन्‍दगी

झरती नीम की सूखी पत्तियों की तरह हो गई जिन्‍दगी।
यों कसैली चिपचिपी निबोलियों की तरह हो गई जिन्‍दगी।। 

नजर का नजरिया ही और हो गया मन की हाट में-
तोल में तोला-माशा-रत्तियों की तरह हो गई जिन्‍दगी।

लाश से घिसटते हुए जी रहे हम बेहया हो इस कदर,
कि अन्‍धड़ में उड़ती चिनगारियों की तरह हो गई जिन्‍दगी।

लड़ती रही रोज-रोज भूख अपनी ही देह से लड़ाई,
यहां धुंआती गीली लकडि़यों की तरह हो गई जिन्‍दगी।

उम्र सारी गुजर गई हमारी यो लड़ते अंधेरों से,
रात भर पिघलती मोमबत्तियों की तरह हो गई जिन्‍दगी।

ढो रही बोझ अनचाहा निरन्‍तर, मिलता न पल भर विश्राम,
थरथराती रेल की पटरियों की तरह हो गई जिन्‍दगी।
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Wednesday, September 5, 2012

..... परेशां बागबां




अजीजों की मोहब्‍बत से भी अब गिला होता है।
औ’ आबे-जमजम में भी अब जहर मिला होता है।।

गुल कम गुलिस्‍तां में कांटे  बहुत परेशां बागबां,
सहरा में गुल मोहब्‍बत का कहां खिला होता है।

पूजा के नहीं ये मंदिर-मस्जिद ये गुरूद्वारे,
अब फिरकापरस्‍ती फितरतों का किला होता है।

सुहाता नहीं काजल आंख को आंख फोड़े देती,
दिल से दिल का कहां इस जहां में सिला होता है।

बेकसों के खूं से रंगे हाथ किसके नहीं यहां।
आजकल सुबह-शाम बस यही सिलसिला होता हैा
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Tuesday, September 4, 2012

लहर से दूर कूल हो गए




चांद-सूरज, धरती औ’ आकाश सब बबूल हो गए।
टिमटिताते तारे चुभते द़ष्टियों में शूल हो गए।।

फ्रीज हुआ जा रहा कि आदमी बन्‍द गवाक्षों में,
बसंती बेला-चमेली अब प्‍लास्टिकी फूल हो गए।

सर्जक ही संहारक हो कर रहे विश्‍व को आक्रांत,
विज्ञानी-समीकरण हल करते-करते मूल हो गए।

क्रिस्‍टल-कम्‍प्‍यूटर है विकास के बढ़ते चरण मगर-
आदर्श थे जितने सब रेडियोधर्मी धूल हो गए।

धरा से नभ तक सिर उठाए खड़े कि बारूदी-पहाड़,
गगन में शांति के कबूतर उड़ाना फिजूल हो गए।

जुलूस की भाषा बोलते हैं विसंगतियों के पुरोहित,
उजाले की इबारत काटना जिनके उसूल हो गए।

बिसर गए संकल्‍प सभी साथ-साथ अंजुलि भरने के,
डूबते-उतराते रहे, लहर से दूर कूल हो गए।
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