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Tuesday, August 14, 2012

सावन बीता जाए

ओ आकाशी बादल
सावन बीता जाए,
चुप बूंदी की पालय !

छिपे कहां विश्‍वासी,
मरू –धरती है प्‍यासी,
खिले क्‍यों न श्‍याम-घटा के
अधर-विम्‍ब पाटल !

हरियाले सोमवार
सूखे तीज-त्‍यौहार,
हाथों राची न मेंहदी,
अँजा न नयन काजल  !

डालों डले न झूले
जीवन रंग सब भूले,
प्‍यारे ढोर-ढंगर
भूले कहां जल-छागल ?

ओ आकाशी बादल
सावन बीता जाए,
चुप बूंदी की पालय !
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Monday, August 13, 2012

गांव-गैल बरखा हुलसे




सावन बरसे, भादों बरसे।
तुम बिन सजना, नयना तरसे।।

झिरमिर-झिरमिर
यह चौमासा
मन का पपीहा
फिर भी प्‍यासा।

विराजे क्‍यों परदेशी पिया,
यौवन का यह बिरवा झुलसे।
तुम बिन सजना, नयना तरसे।।

चपल चंचला,
दप-दप दमके,
बूंदें आंगन
छमछम छुमके।

रोम-रोम का बदला मौसम,
भीगी परवा-फहार परसे,
तुम बिन सजना, नयना तरसे।।

हरियाले हैं ये सोमवार,
पिया मिलन के
तीज त्‍यौहार।

कजरी गाती, मेघ मल्‍हार,
गांव-गैल यह बरखा हुलसे।
तुम बिन सजना, नयना तरसे।।
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Sunday, August 12, 2012

तृप्ति के वास्‍ते


बहुत दिन हुए
ऊब पीते हुए,
चलो इस घड़ी
तृप्ति के वास्‍ते
गीत ही गुनगुनाएं।

अपने ही घर में
जी रहे हो कर प्रवासी,
हंसी के चेहरे
छा रही उदासी।

रिश्‍तों के दर्पण
अदेखे ही
चटक गए,
बहुत दिन हुए
दूरियां मापते,
चलो, इस घड़ी अधर ही जुड़ाएं।

डूबी-डूबी आवाजें
हम
बन रे कूप,
बरगद से फैले भी
बाहों में छिपी नहीं धूप।

प्रस्‍तर प्रतिमा से
मूक ही रहे हम,
बहुत दिन हुए मौन जीते हुए
चलों, इस घड़ी हम व्‍यथा ही सुनाएं।
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Saturday, August 11, 2012

पत्‍तों से प्रात झरे


कोलाहल से दूर
बैठ हम वैसी बात करें
पूरी रात करें।

बहुत पी चुके
क्‍लोरीनेटिड जल
कडुआ गए शब्‍द
प्रणय गीत के,
गर्भवती पीड़ाओं की भीड़ में
भटग गए हैं पांव प्रीत के।

टीनापोल घुले व्‍यवहारों से,
दूर चलें, जहां जलजात तिरें,
पत्‍तों से प्रात झरे।

न अब गुलाबी नशा
आंखों में -
छिपकली से संदेह पलते हैं,
भिटियारिनों से दीवारों पर
चिपके पोस्‍टर दृष्टि छलते।

प्‍यारे नल छोड़
सरिता-तट चलें
हम-तुम अंजुलित साथ-साथ भरें
फिर निखरें।
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Friday, August 10, 2012

टेबुल से टेबुल तक




एक युग 
बीत गया,
शब्‍दों में ही बतियाते,

कर न पाए 
क्षण भर,
मन से 
मन की बातें।

कुलटा फाइलों के 
संसर्ग में,
इसकी उससे करते,
अपना तो कोई 
बोध नहीं
भेड़ चाल से चलते।

खेला किए 
शतरंजी चालें,
टेबुल से टेबुल तक घातें।

लिखते-लिखते 
संकेतों में,
स्‍वयं हो गए संकेत,
रहे हम तो 
मात्र 
निपूती रेत।

खाली नोटशीट,
आंकते हैं ऋण के खाते।
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Thursday, August 9, 2012

टूट कर सूरज से




भीड़ में
खुल सकते नहीं
किवाड़ मन के।

सिर्फ रह जाते हैं कुछ
मौन के पर्दे हिलकर
तारकोली-अधरों पर
पैबन्‍द हंसी के खिलकर।

लयहीन
कलों के शोर में
बोलते हैं सिर्फ, कोण नयन के।

आलपिनों की नोक पर
झुका मिमियाता संवाद
रोज एक ही अर्थ का
बासी शब्‍दानुवाद।

टूट कर सूरज से
कर लेते हैं बन्‍द
मकानों में शव तन के।

ओढ़ कर तिमिर
श्‍वासें किरचों से
दु:ख अपने सी रहीं।

ढंक सकते नहीं
उधार के सृजन से
शरीर निर्वसन के ।
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Wednesday, August 8, 2012

क्षण है श्रृंगार के



मन-विहग गाए,
यह उड़-उड़ जाए,
गन्‍ध जूड़े कसे, महके बयार के।
छू गए कौना-आन्‍तर द्वार के।।

रंगों की फुहार,
रंगों की पुकार,
बरजे क्‍वांरी याद को मन भार के।
कि आई यह उमर, यौवन उभार के।।

बसन्‍ती बोलियां,
फूल की डोलियां,
फागुन-पाहुन गाए गीत प्‍यार के।
शरद्-चिरिया उड़ी, पांखें पसार के।।

पांव लिपटे सपन,
नृत्‍य करते मगन,
शाख-शाख
से पिंकी-स्‍वर मनुहार के।
आए चढ़ कांधे, पवन कहार के।।

गौर रसवन्‍ती,
दुल्हिन जलवन्‍ती,
विरम रही नयन, आंसू संभार के।
पिया न आए यह, क्षण है श्रृंगार के।।
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