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Sunday, July 15, 2012

कड़वी यादें



फिर से सीमान्‍त पर
बे मौसम
रेत गरमाने लगी है
फिर से आदमी के
कच्‍चे गोश्‍त की तलाश में
उड़ने लगी है
आकाश में चीलें।
सुना है,
कुछ उन्‍मादी लोग
मुट्ठियों में बारूद भर
केसरिया हवाओं में उछाल रहे है।
फिर से,
फूलों के गांव में
केसर-क्‍यारियों में
बिखरे मकरन्‍द को खाने
दौड़ी आ रही है
चीटियां।
दोस्‍त
अक्‍सर ऐसा होता है
किस अनचाहा युद्ध-बोध
मेरी चेतना को सौंप जाता है
पिछली नीम सी कड़वी यादें।
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Saturday, July 14, 2012

दृष्टि-भ्रम




हम देखते हैं
आस-पास
या
दूर-पास
रंग-बिरंगा
पीला, नीला, हरा,
उन्‍नावी, करझल,
ककरेजी-फिरोजी
या कोई और,
यह तो
सूर्य की किरणों का

तमाशा भर है

हमारी द़ष्टि का भ्रम है

सत्‍य से परे हैं

सत्‍य तो-

सूर्य है।

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Friday, July 13, 2012

पानी से जुड़ें



तुमने
देखा होगा
तूफानी हवा के साथ
उतुंग लहरों का
तटों से टकराना,
सागर को खंगालना,
जैसे
टुकड़े-टुकड़े कर देंगी
सागर को,
पर क्‍या
पानी से जुड़े
गहरे
अन्‍तरंग-मन
सागर को
बांट पाई है
ये लहरें ?
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Thursday, July 12, 2012

शून्‍य में लटका देश



बूढ़ी होती नसों में
जीने की आकांक्षा
प्रेत बन कर
धरती और आकाश के बीच
भटक रही है
और जवान नसों में खौलता खून
मुट्ठियों में
भींच लेना चाहता है
मानसून।
दो ध्रुवों के संघर्ष का
क्‍या हो परिणाम
कोई नहीं जानता,
हर कोई
हवाओं में मुट्ठियों तान-तान कर
बन जाना चाहता है इतिहास,
इनमें से
कोई नहीं चाहता
अपनी-अपनी पीक के निशानों पर
पराजय के झण्‍डे गाड़ना।
गर्म तपती रेत पर
नंगे बदन
छालों को सहेजता देश
शून्‍य में लटका है,
ऐसे में
कौन, कैसे करे
स्‍वतंत्रता का आन्‍दोलन ?
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