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Monday, July 9, 2012

सड़क की तलाश

पहाड़ से उतर
पगडंडी
गांव से शहर तक जाते-जाते
सड़क बन गई।
शहर की शुभ्रोज्‍ज्‍वल
ऊँचाइयों की
अंधेरी तलहटी में
महसूस किया
कि वह सड़क
जो मुझे और तुम्‍हें
मंजिल तक ले जाती है
हमारे भीतर ही
कहीं गुम हो गई है।

अब
हम-तुम
न उसे सड़क ही कह सकते हैं
और न पगडंडी ही,
जो कुछ भी
हमारी अन्‍तरंगता हो सकती थी
वह हम पीछे छोड़ आए
और हर कोई
लड़ रहा है
पहाड़ से।
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Sunday, July 8, 2012

आशा का बसन्‍त



आशा
मेरी जीवन सहचरी है
जो मुस्‍कान बन कर
मेरे ही अधरों पर नहीं
कृषक-बाला की
सहज उभरती तरुणाई-सी
बालियों में भी अंगड़ाई लेती है।
विश्‍वास मेरी
प्रियतमा के
पलकों की प्‍याली का
अमृत है
जिसकी छलकती हुई बूंदों के
इन्‍द्रधनुष
सूरज से भी आंख मिचौली खेलते हैं।
प्रीति और करुणा
मेरी प्रेयसी की
मदभरी आंखें हैं
जिनमें
अवसादों के मेघ घिर-घिर कर
तप्‍त हृदयों पर
दिलासा की झड़ी लगाते हैं।
घृणा और असत्‍यता
मेरी रानी की
दो-दो दासियां हैं
जो चरण चम्‍पी की गंगा में
अपने कालेपन को धोकर
कृपा को पात्र
बनना चाहती है।

मेरा भोग
बदलों की
रिमझिम के संगीत के साथ
नाचती-गाती फसल की
हरी जवानी का
छलकता आँसू है
जो
किसान की आँख में बसा है,
मेरा यौवन

आशा का बसन्‍त है।

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Saturday, July 7, 2012

कविता



बन्‍धु रे !
कविता
रोटी नहीं जो
भूख से बिलखते
लोगों का पेट भर सके।

जो आधे पेट खट-खट कर
नंगे बदन, पसीने से लथपथ
खून सींच-सींच कर
फसल उगाते हैं।
कविता तो उन
मेहनतकश लोगों का
गीत है,
प्रेरणा है,
आगे बढ़ने की शक्ति है
जिसकी लय पर
मैं, तुम, वह
फसल की रक्षा के लिए

'गोफिया'

हाथ में उठाते हैं।

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Friday, July 6, 2012

क्रांति-रेखा




मेरी आस्‍था का आलोक
सूर्य में प्रतिबिम्बित है,
चांदी की तरल गंगा है
जो अपने अस्तित्‍व जल-तरंगाकुल समुद्र में
विलीन होने जा रही है।

मेरी आशा
अनन्‍त आकाश में
उड़ान भरने वाली स्‍वच्‍छन्‍द चिडि़या है,
जो तिजोरियों के पिंजरे में
कभी बन्‍द नहीं होगी।
शोषण के मखमली
मुलायम गदृों पर लेटे हुए
क्रीड़ा-विलास दम्‍पत्‍ती नहीं है
जिसे श्रम-शिव का तृतीय नेत्र खुलने का डर हो,
वीणावादिनी के
कोमल कोरों की अंगुलियों से
बिखेरने वाली तारों की स्‍वर-लहरी है,
उजड़े हुए हृदयोद्यान में
बसन्‍त की पहली लहर है,
तप्‍त-वसुधा पर
पावस की पहली बूंद है,
मिलों के धुओं में घुटने वाली
अनन्‍त आत्‍माओं की हथेलियों में
खिंची हुई
क्रांति-रेखा है।
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Thursday, July 5, 2012

आभार

सभी पाठकों का आभार कि आपने अशीर्ष कविताओं को पसन्‍द किया और सराहा तथा मुझे प्रोत्‍साहित किया कि इस पर ज्‍यादा से ज्‍यादा लिखा जाए। यह संकलन आज पूरा हो गया है। यह संकलन अशीर्ष कविताओं के नाम से था, जिसमें सभी कविताएं बिना शीर्षक की हैं। मेरे द्वारा शीर्षक देकर इन कविताओं को पुन: आपके समक्ष प्रसारित किया गया और 1984 के प्रकाशन के बाद इस संकलन को पुन: जीवित करने का प्रयास मेरे द्वारा किया गया।

कल दिनांक 6 जुलाई, 2012 से दूसरा संकलन ''अनुभूतियों के क्षण'' 1988 में प्रकाशित हुआ था और इस संकलन को पुन: प्रसारित करने का प्रयास किया जाएगा जिसके अन्‍तर्गत सभी कविताएं मय शीर्षक प्रकाशित हुई हैं।

आशा है कि पूर्व की भांति मेरा उत्‍साहवर्धन करेंगे और अपने अमूल्‍य टिप्‍पणियों से मुझे अवगत कराएंगे।

धन्‍यवाद।

आपका संजय सिंह जादौन

Wednesday, July 4, 2012

सुमन खिलने दो

बलात्‍कार
ढाकाजनी
अकालीदल असंतोष
असम बंद
सुबह की चाय के साथ
यही सब तो पीया है;
यह सुबह
और दिन से अधिक गमगीन है
कोई नहीं ताजगी
कोई नहीं नयापन
कोई नहीं.........कोई नहीं........
वही बासीपन
बस यही लगता है
बसंत के आने से पहिले ही
कलियों को नोच लिया
चुना नहीं,
धुंए को गाली देने वालों ने
आक्‍सीजन को भर लिया
सिलेण्‍डरों में
और
कार्बन-डाई-आक्‍साइड उगल दिया उपवन
हर एक पौधे का दम घुट रहा है
बेजार है
एक तरन्‍नुम-सी जिन्‍दगी
बासन्‍ती बयार की
लय, गीत, संगीत
सब कुछ डस लिया
गुनाहों के अंधेरों ने
उमस में जीने को
विवश कर दिया
इस पूरी पीढ़ी को
पूरी सदी को।
ओ, मेरे रहबर।
सूर्य को
रोको मत
सुबह को उतरने दो
गीता, कुरान, बाइबिल
हर प्रार्थना को व्‍यापक होने दो
शब्‍द को घनत्‍व दो
भारत-माँ की पूजा के
सुमन खिलने दो।
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Tuesday, July 3, 2012

गणतंत्र दिवस

हां
26 जनवरी
गणतंत्र दिवस
शहीदों के रक्‍त से लिखा इतिहास
कोटि-कोटि जन-जन का उल्‍लास
एक आजम है खुशी का चारों ओर;
मगर
मजदूरी के अवकाश से
बिना मजूरी के
एक जर्जरित माँ
बीतते माघ की सर्दी से ठिठु‍रती
खुद भूख को दफन कर
नीचे खुले आकाश के
ईंटों के चूल्‍हे के पास बैठ
चापड़ की रोटी खिला
निर्वसन-बच्‍चों की धंसी-धंसी आंखों में
आसमानी परियों की कहानियां उंढेलती है
आने वाले कल की
नई संभावनाओं की स्थिति की
एक पीढ़ा को भोगकर
एक पीढ़ा को प्रसवती है।
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