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Thursday, July 5, 2012

आभार

सभी पाठकों का आभार कि आपने अशीर्ष कविताओं को पसन्‍द किया और सराहा तथा मुझे प्रोत्‍साहित किया कि इस पर ज्‍यादा से ज्‍यादा लिखा जाए। यह संकलन आज पूरा हो गया है। यह संकलन अशीर्ष कविताओं के नाम से था, जिसमें सभी कविताएं बिना शीर्षक की हैं। मेरे द्वारा शीर्षक देकर इन कविताओं को पुन: आपके समक्ष प्रसारित किया गया और 1984 के प्रकाशन के बाद इस संकलन को पुन: जीवित करने का प्रयास मेरे द्वारा किया गया।

कल दिनांक 6 जुलाई, 2012 से दूसरा संकलन ''अनुभूतियों के क्षण'' 1988 में प्रकाशित हुआ था और इस संकलन को पुन: प्रसारित करने का प्रयास किया जाएगा जिसके अन्‍तर्गत सभी कविताएं मय शीर्षक प्रकाशित हुई हैं।

आशा है कि पूर्व की भांति मेरा उत्‍साहवर्धन करेंगे और अपने अमूल्‍य टिप्‍पणियों से मुझे अवगत कराएंगे।

धन्‍यवाद।

आपका संजय सिंह जादौन

Wednesday, July 4, 2012

सुमन खिलने दो

बलात्‍कार
ढाकाजनी
अकालीदल असंतोष
असम बंद
सुबह की चाय के साथ
यही सब तो पीया है;
यह सुबह
और दिन से अधिक गमगीन है
कोई नहीं ताजगी
कोई नहीं नयापन
कोई नहीं.........कोई नहीं........
वही बासीपन
बस यही लगता है
बसंत के आने से पहिले ही
कलियों को नोच लिया
चुना नहीं,
धुंए को गाली देने वालों ने
आक्‍सीजन को भर लिया
सिलेण्‍डरों में
और
कार्बन-डाई-आक्‍साइड उगल दिया उपवन
हर एक पौधे का दम घुट रहा है
बेजार है
एक तरन्‍नुम-सी जिन्‍दगी
बासन्‍ती बयार की
लय, गीत, संगीत
सब कुछ डस लिया
गुनाहों के अंधेरों ने
उमस में जीने को
विवश कर दिया
इस पूरी पीढ़ी को
पूरी सदी को।
ओ, मेरे रहबर।
सूर्य को
रोको मत
सुबह को उतरने दो
गीता, कुरान, बाइबिल
हर प्रार्थना को व्‍यापक होने दो
शब्‍द को घनत्‍व दो
भारत-माँ की पूजा के
सुमन खिलने दो।
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Tuesday, July 3, 2012

गणतंत्र दिवस

हां
26 जनवरी
गणतंत्र दिवस
शहीदों के रक्‍त से लिखा इतिहास
कोटि-कोटि जन-जन का उल्‍लास
एक आजम है खुशी का चारों ओर;
मगर
मजदूरी के अवकाश से
बिना मजूरी के
एक जर्जरित माँ
बीतते माघ की सर्दी से ठिठु‍रती
खुद भूख को दफन कर
नीचे खुले आकाश के
ईंटों के चूल्‍हे के पास बैठ
चापड़ की रोटी खिला
निर्वसन-बच्‍चों की धंसी-धंसी आंखों में
आसमानी परियों की कहानियां उंढेलती है
आने वाले कल की
नई संभावनाओं की स्थिति की
एक पीढ़ा को भोगकर
एक पीढ़ा को प्रसवती है।
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Monday, July 2, 2012

कटे आदमियों के ढेर


हम पीढ़ी-दर पीढ़ी
विरासत में प्राप्‍त
नपुंसक भाग्‍य के नाम पर
जीने के अभ्‍यस्‍त,
जिनको नहीं होती कोई
हरारत
किसी के साथ जीने की
लिपटने की।
हम कटे आदमियों के ढेर
दृष्टि-विहीन,
आस्‍थाहीन,
डूबी-डूबी आवाजे
घिघियाते
लुटी अस्मिता के
हारे हुए कबंध-लोग
अस्थिपंजर मात्र
टूटे कंधों पर
खिचियाये विक्रम को ढोते-ढोते
पस्‍त होकर
समर्पित कर देते हैं
अपनी समग्र उपलब्धियों की देह

लम्‍बी चोंच से नुचवाने

खूंखार पंजों वाले

गिद्दों को।

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Sunday, July 1, 2012

मूर्तिकार


मैने मेरे बच्‍चों को
वह
समझ- सोच को
सुसंस्‍कृत कला दो
कि
शब्‍दों को
छैनी की भांति
इतना
पैना करो
कि
संस्‍कारगत रूढ़ियों की
परतों को
खूरच डालें।
छैनी के
तीखेपन में
उस कुशल मूर्तिकार की
समझ-सोच हो
कि
मन खरोंच न पड़े,
रूपविधान,
अंतर्वस्‍तु
सभी शालीन संस्‍कार
उनकी भाषा को दिए
नहीं दिया
तो सिर्फ
उन्‍हें
दोगली भाषा का ज्ञान
जिसके
अभाव में
वो
अभिमन्‍यु की तरह
घिर गए
कौरवी चक्रव्‍यूह में।
किन्‍तु
उम्र बढ़ने के साथ-साथ
आज बच्‍चे सीख गए
कि
मेरी सारी समझ-सोच
हो चुकी है
बुजुर्वा
और
वक्‍त ने उन्‍हें
बना दिया है
मूर्ति-भंजक।


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Thursday, June 28, 2012

लेटर बॉक्‍स


दुनियाँ
एक लेटर बॉक्‍स है
जिसमें
हम सब
पोस्‍ट कार्ड से नंगे
जिनका
कुछ भी नहीं गोपनीय
स्‍वत:
कर देते हैं प्रचारित
मन के भेद।
कोई
रंग-बिरंगे सजे-संवरे
मौन-निमंत्रण-से,
किडनेप कर लिए जाते हैं
जो रास्‍ते में
गन्‍तव्‍य से पहिले
और----कुछ
गलत पते के पत्र-से
भटकते रहते हैं यहां-वहां
और
अन्‍त में डाल दिए जाते हैं
डैड-लेटर्स में।
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Friday, June 22, 2012

हाड़ का मर्द

छा गया है
जिन्‍दगी के सम्‍पूर्ण
केनवास पर
दर्द
जैसे बन्‍द कमरे की
तस्‍वीरों पर चढ़ी हो
गर्द
और हटाते-हटाते
मलबे में
जिसके दब गया है
हाड़ का मर्द।
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