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Tuesday, June 19, 2012

विकलांग मन

सूरज के सम्भाव से
मेरे घर की
काई लगी, पपड़ाई
दीवाल पर भी फैंकी
मुट्ठी भर किरणें
मैं समझा
धूप है अरूप,
उत्तर दिया
मेरे सिर के ऊपर से
बोलते, उड़ते
खग-वृन्‍द ने
मेरे विकलांग मन की
कोडि़यायी शंका को,
ऊपर देखा
आकाश में
सूर्य तो उजला ही था।
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Monday, June 18, 2012

आइस्‍क्रीम

पूज्‍या को
मैंने
नमस्‍कार किया
थमा दी
मुझे
आइस्‍क्रीम,
भागता रहा मैं भागता रहा
पार कर कमरे से आंगन द्वार तक,
ठोकर से देहरी की
छटक कर हाथ से
गिर गई
आइस्‍क्रीम,
धूल सिर चढ़ गर्इ
बन्‍ध्‍या इच्‍छाओं के गर्भ में
भर गया तारकोल।
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Sunday, June 17, 2012

अहम् का हथौड़ा


अहम् का हथौड़ा
तोड़ता है
संयम की सांकल
गरजते हैं
इन्फिरियोरिटी-सुपीरियोरिटी
काम्‍ल्‍लेक्‍स के
बादल
तब, विधवा इच्‍छाएं
विषमता के गंदले दर्पण में
आंजती है
क्षोभ के कड़ुए तेल का
काजल।
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Saturday, June 16, 2012

हैंगर


ऐकान्‍त
बन्‍द कमरे में
मन का टेलर
सूती, रेशमी, टेरेलिन के
काल्‍पनिक वस्‍त्र
सी-सी कर टांकता है
मस्तिष्‍क के हैंगर पर
जिन्‍हें
समय का बौना पुरूष
पहिन-पहिन कर
उतार देता है
नंगी भीड़ के खुले कमरों में।
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Friday, June 15, 2012

ऊँ... शान्ति....

सिर कनपटियों के
सफेद बालों पर लगा कर खिजाब
करते हैं देखने का प्रयास
बैसाखियों के उस पार
दूर छूटे ख्‍वाब,
बहुत चाहते हैं झुंठलाना
बोनी दुनिया के
बुढ़ापे को
छू पाना
मगर
संशयों की जुगाली करते
देखते हैं आगत को,
बंदरी की तरह सीने से चिपकाए हैं
मृत बच्‍चे से विगत को,
मूक-बधिर से बोलने की छटपटाहट में
कोसते हैं वर्तमान को,
मोतियाई-दृष्टियां
देख नहीं पाती स्‍वच्‍छ दिनमान को
और
निहारते ही अल्‍हड़-यौवना को
असमय
तोड़ते हैं तिलस्‍मी रहस्‍य,
पपड़ाए होठों की
वीरना डयोड़ी पर
ऊंघते शब्‍द लड़खड़ाते हैं
ऊँ शांन्ति...........।
ऊँ शांन्ति...........।
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Thursday, June 14, 2012

वहशीपन


रात के अंधेरे में
उग आए
नाखून,
चेहरे पर
वहशीपन को
हर दिन
पर्दे के सामने आने से पूर्व
सूरज के आइने में
खुरचते, काटते हैं;
क्‍योंकि
जानते हुए भी
हम
एक दूसरे के सत्‍य को
नहीं चाहते उजागर करना।
पहिनाते हैं वस्‍त्र
लगाते हैं उबटन खींचकर बलात
खड़ी करते हैं
होंठों के काउन्‍टर पर
सेल्‍सगर्ल की मुसकान,
जो करती है,
हर सामने वाले का स्‍वागत।
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Wednesday, June 13, 2012

''मैं''


5.
कितनी छोटी है अंगुलियां,
छोटी है
परन्‍तु
सशरीर से जुड़ा
आदमी कितना बड़ा
जिन पर है खड़ा।
बात तो यह है अचरज की
आदमी हुआ है छोटे से बड़ा
फिर भी रहता है
छोटों से
हरदम अकड़ा,
''मैं'' के
सर्पपाश में है
जकड़ा आदमी
है कितना बुद्धि का लंगड़ा।
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