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Monday, May 14, 2012

मैं नहीं जानता, मैं क्‍या बोलता हूँ ?

मैं नहीं जानता
मैं क्‍या बोलता हूँ ?
एक ही के प्रति
मेरे हो जाते हैं
दो अभिमत
झुठला देता हूँ
स्‍वयं की लिखी इबारत
हर बोध को
स्‍वार्थ की तुलना में तोलता हूँ।
मैं नहीं जानता
मैं क्‍या बोलता हूँ ?

जो पहले थी भली
वहीं फिर हो जाती है बुरी
देता हूँ गालियां
मेरी कोई नहीं होती धुरी
टिकने को स्‍वयं के ‘स्‍व’ को-
कुण्‍ठाओं की
कुल्‍हाडी से छीलता हूँ
मैं नहीं जानता
मैं क्‍या बोलता हूँ ?

मेरा बडप्‍पन
हो जाता है बौना
अहम की तपती दुपहरी में
झुलस कर सूखा दौना
जिसमं शंका के छेद से
रिस जाता है सारा विश्‍वास
यों विवेकहीन अन्‍धेरे में
खालीपन को खंगालता हूँ
मैं नहीं जानता
मैं क्‍या बोलता हूँ ?
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Saturday, May 12, 2012

भीड


खुली भीड
बन्‍द भीड
अनियंत्रित भीड
नारों और जयकारों की भीड
देखते हैं हम सब
अधिक सभ्‍य हो गए हैं
और बर्बरता
नए बोध का काला चश्‍मा लगा
घुल गई
चुस्‍त बहुरंगी सभ्‍यता में।
नए आयाम
नए प्रतीक
नये बोध
अत्‍याधुनिक युग का आविर्भाव
नील-नीलान्‍त अन्‍तरिक्ष की
खुलती सीढियां
मगर
ऊपर से नीचे को उतरता है
एक प्रश्‍न चिन्‍ह ?
उपलब्ध्यिों की अश्रुत गोद में
महा-अभाव के महा-शून्‍य में
आणविक – प्रक्षेपास्‍त्रों से
भयभीत
विष्‍मताओं की घाटियों में
गूंजता
पूछ रहा है अपनी ही आवाज में
कि नये आयाम पर
क्‍या पाया ?

प्रिय पाठकों का आभार

प्रिय पाठकों,
यहां पर मेरे पिता द्वारा लिखित ''अशीर्ष कविताएं-1984'' में प्रकाशित संग्रह में संग्रहित कविताएं हैं, जिनका शीर्षक नहीं है। इस संग्रह की सभी कविताएं बिना शीर्षक हैं।  इनके संग्रह में मृत पडी कविताओं को बरसों बाद यहां मेरे द्वारा शीर्षक देकर  पुन: जीवन प्रदान करने का प्रयास किया है। ताकि आपको कविता पढने में आसानी हो।

मुझे आशा है कि आपको यह मेरा प्रयास पसन्‍द होगा।

-- संजय सिंह जादौन

बीत गया बरस

बीत गया बरस
बरबस।
पढते-पढते अखबारी
घटनाएं ।
सहमी-सहमी गूंगी
संध्‍याएं।
अपने को सहेजने
के प्रयास में
टूट गया थर्मस।
बीत गया बरस
बरबस।
निभाने को बनी रहीं
सौगातें
सन्‍दर्भों से कटी हुई
बातें
राह चलती लडकी का ज्‍यों
अचानक झपट गया पर्स ।
बीत गया बरस
बरबस
थक गया मन चर्चित
क्रीडाओं से
टूट गया अन्‍तस ज्‍यों
प्रसव-पीडाओं से
बांट गई ढेर से तिकोन
सरकारी नर्स।
बीत गया बरस
बरबस।

Friday, May 11, 2012

कुण्‍ठाएं

जो कहूं
मेरे मन करोगे , सुनोगे ?
हम जो करते हैं
हम जो कहते हैं
शब्‍दों के बीज जो बोते हैं
जानते हो कितने घुने होते हैं ?

करनी-कथनी में रहूँ
ऐसा कोई शास्‍त्र गुनोगे ?
 मंची अभिनेतायी भाषण
कहां होते हैं आचरण ?
कुण्‍ठा ग्रस्‍त होते हैं कर्म हमारे
खडी करते हैं शंकालू दीवारें।
निर्वसन-तन ढंक दूँ
वह वस्‍त्र बुनोगे ?

 करते हैं बातें नए समाज की
पर  रहते हैं छीना झपटी में
कुर्सी व ताज की
उडती रहेगी जब तक
रेत व सूखे पत्‍ते लिए काली आँधी
बन पाएंगे कैसे
नेहरू, विनोबा ओ' गाँधी ?

हर रोते के आंसू पीलूं
कुण्‍ठाओं से उन्‍मुक्‍त हो,
पिछडे हुए को गले लगाओगे ?



Thursday, May 10, 2012

एक ही जादू, दूर दृष्टि, पक्‍का इरादा

मैं
स्‍वार्थों की
आयातित क्रीम से
चेहरे का मैक-अप कर
अपने
कार्यालय की टेबिल के सामने
दीवार पर
देश की प्रधानमंत्री का चित्र
एक ही जादू
कडी मेहनत
दूर दृष्टि
पक्‍का इरादा
अनुशासन
टांक कर
स्‍वयं से अधिक छलता हूँ
आगन्‍तुकों को
और फिर
दिन भर कार्यालय समय की
जुगाली करता हुआ
टेबिल पर पाँव पसार
पढता हूँ
कोई जासूसी उपन्‍यास।

छैला सा

कभी
छैला सा
बन-संवर
गंधायित
तो कभी
उखडा-उखडा
धूलि-धूसरित  सा
उपवन की
गलियों में
भटकता रहता है,
छेडता है
कलियों को, लताओं के
हरित-किशलय
कपोलो की
भरता है
चिकौटियाँ
और
खडक-खडक कर
पत्तियां
कितना
आवारा है
पवन।