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Wednesday, October 10, 2012

बीते सावन की यादें


गर्मी से झुलसे
वन-पर्वत हुलसे
जल की लिए छागल
पहाड़ी के पार जो दिखा बादल।
ग्रीष्‍म से तपते
द्रुम-लता
पात-पात का कर चुम्‍बन,
सूत कातती
तकली-सी नाचती बदली
लायी प्रणय का निमंत्रण;
आया आषाढ़
नहाया पहाड़
भीज गया भीतर-बाहर
छुमकी जो बूंदी की पायल।
अकेले में
बिजली की देह

कर जाती मन खराब

चिहुंक-चिहुंक उठता

कामातुर

जलपांखी मेघ पीकर शराब;

गाती कजरी

पगली बादरी

बीते सावन की यादों में

सिसकता है बूढ़ा जंगल

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Tuesday, October 9, 2012

श्रम संवलाई मजूरन



बासन्‍ती
बयार की सरगम पर
नृत्‍य करती
पीली सरसों
शिशिर की
ओस-बूंदों का आसव पी
जवान होती
गेहूं की बालियों का लहलाहता
दर्प।
यह सब
देखती है
खुली आंखों
सच होता
भोर के स्‍वप्‍न-सा
पाणत करती
श्रम-संवलाई मजूरन;
उसके कोकिल-कंठी
हलवाहे हर्ष-गीत
बुनते हैं
उसका
वर्तमान
भविष्‍य की तुलना में

जीती है

वर्तमान को

वह

पसीने से लिखती है

रोज

श्रमजीवी पौरुष का

मुक्ति काव्‍य।

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Monday, October 8, 2012

मेरे बच्‍चों !




आज
जब हाथ को हाथ नहीं सुहाता
उजालों पर कर रहे हैं
अंधेरे
प्रहार पर प्रहार
योजनाबद्ध सलीके से
सूरज, चांद-सितारों,
परियों के सपनों से
रिक्‍त किया जा रहा है।

तुम्‍हारा
आकश
और
डूबते जा रहे हो
कहीं दूर
गहरे और गहरे में
जैसे
कोई अवरूद्ध कर रहा हो
मां के मधुर कंठ को,
मेरे बच्‍चों !

मां की लोरी से बढ़ कर
कोई आशीर्वाद नहीं
मां से बढ़ कर
कोई देव प्रतिमा नहीं
कोई मजहब नहीं
तुम्‍हें
उन्‍मत्‍त प्रभंजन के होंठ चूम
अन्‍धकार को वल्‍लरी पर
अंकुरित हो खिलना है
सूर्य फूल-सा।
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Sunday, October 7, 2012

फटी बिवाई की पीर



आज भी
बहुत कुछ
अनकहा सा बांचता हूं
तुम्‍हारे नयन में
जब मैं झांकता हूं।
चुक कए क्‍या
सचमुच वो सभी सन्‍दर्भ
सब संवेग
जो हमने साथ जिए थे?
माना कि धुंधला गए
हथेलियों पर खिले
मेहंदी के फूल
बीते कल पर
अब आंसू बहाना है फिजूल।
टीसती तुम्‍हारे
पांव की फटी बिवाई की
अनकही पीर
मैं जानता हूं।
टूट कर बिखरते नहीं
आदमी जीवट वाले
जूझते है नियति से
सुख दु:ख के हर फासले को
नापते हैं पांव की गति से
धुंध में डूबा
दर्द का हर गांव मैं
पहचानता हूं।
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Saturday, October 6, 2012

नए सूर्य की प्रतिक्षा में......


उसने
रक्‍त–मज्‍जा से चिन कर
मेरे भुवन को
अपनी श्‍वांसों के कर्पूर से
सुवासित कर
स्‍वयं गन्‍धहीन हो गया।
मेरे
जीवन का अंधकार पी
अपनी सहज-सरल मुस्‍कानों की पूर्णिमा दे
उसने अमावस्‍या का वरण किया।
उसने खूद को मथ कर
मुझे गेहूं की बालियों सी
छन्‍दमयी कविता दे
स्‍वयं छन्‍दहीन हो गया।
अपने अलगोजे के स्‍वर
मेरी बांसुरी को दे
स्‍वयं बेसुरा हो गया।
मैने
उसने पसीने के समुद्र का मंथन कर
उसकी लक्ष्‍मी का हरण कर
'विष्‍णु' पद प्राप्‍त कर लिया।
वह लक्ष्‍मीहीन
फटेहाल-काला-कलूटा
अस्थियों का ढांचा भर
गड्ढे में धंसी-धंसी
उनींदी आंखों से बुझे सपनों को ले
कल उगने वाले
नए एूर्य की प्रतीक्षा में
जी रहा है।
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