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Tuesday, September 25, 2012

भूख



बन्‍धु रे!
सड़कों,
गली-कूचों,
झुग्‍गी-झोंपडि़यों
उग आती है
सूरज डूबने के साथ
मच्‍छरों सी भिनभिनाती
जिस्‍म फरोशों की
भीड़
बू सूंघती
जिन्‍दा गोश्‍त की
और
बिकने लगती है
भूख।
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Saturday, September 22, 2012

फागुन



उसने
वक्‍त–बेवक्‍त
दर्द को
पसीने के घोल में
घोल-घोल कर
आशा और विश्‍वास की गंध से मिश्रित
जोगिया, बैंगनी, हरित, पीत रंगों के फूल
मेहनत की सुई से
खेत की हरियल सुनरिया पर
टांक दिए
और प्रकृति ने
बड़े दुलार से
रात के सन्‍नाटे में
ओस की बूंदों से
रंगों को और गहरा, चटक कर दिया
इसे मौसम के डाकिए ने
पीत पाती थमा कर
नाम दे दिया
फागुन का।
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Friday, September 21, 2012

समय एक नदी है

पूजा के अक्षत, फूल-पात
सब कुछ
धार के संग बह गया,
डूब गए
आस-पास, घाट
बाढ़ थी गुजर गई
समय एक नदी है,
नाम-रिश्‍ते
सभी नाम के हैं,
बैठे, चले गए
निभाना ही तो त्रासदी है,
एक घरौंदा
बचपन, यौवन
बुढ़ापा का
बना और ढह गया
सतही
रेत में
मोती नहीं
सीपियां ही सीपियां हैं,
बहार
कुछ नहीं
पेड़-शाखाएं
फूल-पत्तियां हैं,
बाद बीतने के
रिक्‍तता का अर्थ
सूनी मांग के
हाशिए तक रह गया।
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Thursday, September 20, 2012

पानी की तलाश

हर वर्ष
रेगिस्‍तान की अपार बालुका-राशि पर
उठता है
अकाल का तूफान,
क्‍या पशु क्‍या नर
सभी की बलि लेता है
अकाल
हर वर्ष रोग-व्‍याधि से ग्रसित
पानी को तरसती
ढाणी-दर-ढाणी को ढंक लेती है
प्रेत की छाया
मनुष्‍य चीखता है
पानी-पानी-पानी
और
शातिर लोग
संन्‍यासी बने
शोध में बैठे
योग-साधना में लीन हो
कूट चक्री इन्‍द्रजाल माया रचते हैं
हर वर्ष
पानी की खोज में।
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Wednesday, September 19, 2012

संकल्‍पहीन लोग



बस्तियों में
घुस आए हैं
खिसियानी बिल्लियों के झुंड-दर-झुंड
नोच नोच कर
चेहरों पर बना दिए हैं निशान।
चेहरे
अपनी पहचान खो चुके हैं,
भद्दे बदसूरत/सब से नजर आते हैं।
अब
इनसे न नफरत ही है और न ही अफसोस ही
ये पाली हुई तो हमारी ही है,
फिर खम्‍भा नहीं नोचेगी तो क्‍या करेंगी?
खम्‍भे से क्‍या कम हैं हम
जिनका कोई स्‍वात्‍म नहीं
हर कोई
खूंटी ठोक टांग देता है अपनी कमीज
पसीने से बहुआती
हाल से मजबूर हैं या नियति हो गई
कि क्षण्‍-क्षण अस्मिता लुटते देखना
या फिर
लगता है कि अभ्‍यस्‍त हो गए हैं।
ऐसे हादसों के
क्‍योंकि
संकल्‍पहीन डरे-डरे सहमें-सहमें
दूर से ही ह्श्‍श्‍श्‍ ह्श्‍श्‍श्‍ कर
भगाने की
निष्‍फल चेष्‍टा कर रहे हैं हम
और
हावी होती जा रही हैं
बिल्लियां‍।
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Tuesday, September 18, 2012

साजिस



ये
जो चीख-चीख कर
धरती से आकाश तक
उछाल रहे हैं
थोथे शब्‍द
यह इनके भीतर की घिन्‍न है
और कुछ नहीं
एक पेट की दूसरे पेट से,
एक आंख की दूसरी आंख से,
साजिश भर है
सूजती आंखों की
मन की आंखों को
अंधा करने की;
अरअसल
ये महंत
एक को अनेक में बांट कर
तुझे-मुझे
बरगला कर
देश के नक्‍शे को
काट कर आरियों से
छीन लेना चाहते हैं
हमारा आजादी का
आकाश।
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Monday, September 17, 2012

हथेलियों पर आकाश



मेरे बुढि़याते
पांवों के नीचे से
छूटती जा रही है सतह।
अब संभव नहीं
स्थिर पांव खड़े होकर
आकाश को थाम लेना,
नस-नस को चीरता
नाखूनों तक
उतर गया है
एक अबोली
पीड़ा का नीला जहर
मेरी लुजलुजी देह के
मोह में
व्‍यर्थ है
भीगी आंखों से
उलीच कर
प्रश्‍न-चिन्‍ह खड़े करना,
क्‍यों खड़े करते हो तुम
प्रश्‍न चिन्‍ह.......?
कोई उत्‍तर नहीं
इस डूबते सूरज के पास
उठो, मेरे बच्‍चों !
मकड़ी के जाले से बाहर आओ,
तुम्‍हीं को अब अपने हाथ की रेखाएं गहरानी है
पसीने की दुर्गन्‍ध को भभकाना है
और फिर हथेलियों पर
आकाश उठाना है ।
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