मेरे काव्य संग्रह
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Friday, June 22, 2012
हाड़ का मर्द
छा गया है
जिन्दगी के सम्पूर्ण
केनवास पर
दर्द
जैसे बन्द कमरे की
तस्वीरों पर चढ़ी हो
गर्द
और हटाते-हटाते
मलबे में
जिसके दब गया है
हाड़ का मर्द।
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Thursday, June 21, 2012
टीनापोल
दूर-दूर तक
गन्दलाई रेत पर
रंगराई पहाड़ी पर
कहीं बिछादी गई
कहीं पेड़ों की टहनियों से बंधी
सूखी रह
टीनापोल से धुली
चांदनी।
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Wednesday, June 20, 2012
अरूणाई
अरुणाई -उषा को
चारू मुस्कान के साथ
आंगन में उतरे
रश्मि-विहंग।
मेरे कमरे की खुली
खिड़की से आकर
दीवार पर लगे दर्पण में
अपने ही प्रतिबिम्ब से
चोंच लड़ाने लगी
चिड़िया।
पड़ौस की
दो पड़ौसिने
आपस में लगी उछालने
मन की कुण्ठाओं की
बासी-बुसी खिचड़ी
!
ईश्वर
!
यह कैसा दिन उगा
?
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Tuesday, June 19, 2012
विकलांग मन
सूरज के सम्भाव से
मेरे घर की
काई लगी, पपड़ाई
दीवाल पर भी फैंकी
मुट्ठी भर किरणें
मैं समझा
धूप है अरूप,
उत्तर दिया
मेरे सिर के ऊपर से
बोलते, उड़ते
खग-वृन्द ने
मेरे विकलांग मन की
कोडि़यायी शंका को,
ऊपर देखा
आकाश में
सूर्य तो उजला ही था।
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Monday, June 18, 2012
आइस्क्रीम
पूज्या को
मैंने
नमस्कार किया
थमा दी
मुझे
आइस्क्रीम,
भागता रहा मैं भागता रहा
पार कर कमरे से आंगन द्वार तक,
ठोकर से देहरी की
छटक कर हाथ से
गिर गई
आइस्क्रीम,
धूल सिर चढ़ गर्इ
बन्ध्या इच्छाओं के गर्भ में
भर गया तारकोल।
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Sunday, June 17, 2012
अहम् का हथौड़ा
अहम् का हथौड़ा
तोड़ता है
संयम की सांकल
गरजते हैं
इन्फिरियोरिटी-सुपीरियोरिटी
काम्ल्लेक्स के
बादल
तब, विधवा इच्छाएं
विषमता के गंदले दर्पण में
आंजती है
क्षोभ के कड़ुए तेल का
काजल।
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Saturday, June 16, 2012
हैंगर
ऐकान्त
बन्द कमरे में
मन का टेलर
सूती, रेशमी, टेरेलिन के
काल्पनिक वस्त्र
सी-सी कर टांकता है
मस्तिष्क के हैंगर पर
जिन्हें
समय का बौना पुरूष
पहिन-पहिन कर
उतार देता है
नंगी भीड़ के खुले कमरों में।
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