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Sunday, June 10, 2012

कोई एक कुर्सी के लिए

कोई एक कुर्सी के लिए
सौंप देता मैं
अगर, स्‍वयं अंधेरों को।

बन्‍द कर लिफाफे में
चरित्र को भेज देता कहीं दूर
पत्‍नी की मांग में भरता
किसी और नाम का सिन्‍दूर।

सच ,
कोई एक कुर्सी पा ही जाता
अगर,
मुँह मोड़ कर हो जाता खड़ा
देखकर उतरते सेवेरों को।

औढ़ आयातित मुस्‍कान
साथ ले साकी ओ जाम
पर्दों के पीछे बन्‍द कक्षों में
होती हर रंगीन शाम।

सिर्फ
उनके एक सुख के लिए
कहता गुलाब अगर कनेरों को ।

सच,
कोई एक कुर्सी पा ही जाता
सौंप देता मैं
अगर, स्‍वयं अंधेरों को।

Friday, June 8, 2012

स्‍वार्थों के बरगद

कुर्सियों से चिपके लोगों के
हाथों गढ़वाते रहें कीलें
हडि्डयों की देह पर
कब तक हम
यातना सहते रहें ?
चर कर पीढ़‍यिों का सुख
स्‍वार्थों के बरगद तले
कर रहे जो शाब्दिक जुगाली,
भला कहां है
देखने को आंखें
उनके सिर्फ दो कोड़ियां हैं
जो देख सके हमारी बेहाली
बाज के शिकंजों में है
इच्‍छाओं के कपोत,
कब तक हम
मुक्ति की वंचना सहते रहें ?
मुर्गे की बांग भोर के आने का वह़म है,
सच तो यह है कि धुँए में
डूबा है सारा आकाश,
चालाक लोमड़ियां
शहर की सड़कों पर घूमती है
उजले वस्‍त्रों में
और समय पाते ही
खा जाती है किसी का विश्‍वास,
कितनी ही उजली भोर की
क्‍वांरी किरण को निगल गए
ये, गुनाह के अँधेरे
आखिर कब तक
किसी कुछ की
सांत्‍वना सहते रहे ?
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Thursday, June 7, 2012

उगते आस्‍था के फूल

बूढ़े, लंगड़े,
बौंडे, खूंटे छोड़े
जर्दिया पान की पीक से
बदुआते
आदर्श-
दांत खिसियाते हैं;
धुंआती अफवाहें
सठियाये संशय
कीलते हैं
मेरी राहों को,
चुगल-खोर हवाओं की
फसफुसाहटें
नोंचती है
मेरे युवा मस्तिष्‍क को;
तब उदास निगाहों को
टांक देता हूँ
आश्‍वस्‍त होने को
तुम्‍हारे रेशमी-बालों पर
और
तुम्‍हारे होठों पर
उगते आस्‍था के फूल
प्रेरणा देते हैं
मुझे
विश्‍वास के देवदार पर
चढ़ने की
आकाश की ऊँचाइयों को
नापने की।
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Wednesday, June 6, 2012

निकल छन्‍दों की कैद से

निकल छन्‍दों की कैद से
गीत
चाहता है नए अर्थ में जीना।
बूड़ी उपमाओं के
अनुसरण का
नहीं चाहता अंकुश
अक्षर
व्‍याकरण का
अवसरवादी अलंकारित
पंक्तियां
है इनकी कुंठित लय-वीणा।
नहीं मांगता तन
स्‍वर्ण स्‍याही का
प्रतीक यह
प्रगीत
संबल हर राही का
शीर्षकों के कोलाहल से
अलग-सा
अपने पानी का स्‍वनाम नगीना।
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Tuesday, June 5, 2012

आंचल


उषा के आंचल की
गांठ खुली
घर आंगन
छत पर
भीतर बाहर
पथ पर
श्‍वेत-श्‍वेत किरणों की
ज्‍वार रुली
जगी भीड़
नगर-ग्राम
धूप से फैले
अनेक काम
बर्फ सी जमी राज
पिघली ।
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Monday, June 4, 2012

बंसी धुन

टूट गए
किरणों के गोफन
सूरज का ग्‍वाला
ले गया घेरे
चरागाहों से
धूप की भेड़ें
लौट रहे
जंगलों से गौधन।
उंढ़ेल गया रंग
नभ के दर्पण पे
घिर गई उदासी
राधा के मन पे
छेड़ रहे
बंसी-धुन मोहन।

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Saturday, June 2, 2012

नेता जी


नेता जी !
देशहित......... ?
''अपवाद''
नेता !
समाजवाद........ ?
''गरम कोट

सर्दी आई पहन लिया

गर्मी आई उतार दिया।''

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