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Tuesday, May 22, 2012

अशीर्षक

1.
गंदलाए बौरे पर्वत के
नंगे पावों के नीचे
लेट गई
सभ्‍यता
छोडकर आकाश की ऊँचाइयां
निर्ससना
कामिनी।
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2.

औरत........
उजलायी सुन्‍दर-सी
एस्‍ट्रे में
यौन की जलती
सिगरेट।
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Friday, May 18, 2012

जंगल

एक सिरे से दूसरे सिरे तक
दूर, दृष्टियों के उस पार तक
फैला है
जंगल ही जंगल, एक काला जंगल
बारूद की दुर्गन्‍ध,
आदमी के जले मांस की संडांध
जिसमें भटकता
आम आदमी
जंगली जानवरों से आतंकित
स्‍वयं अपनी पहचान से कटा
भयांक्रांत
अमानवीय आचरणों का शिकार
वहम पाले है
किसी जनपद में रहने का
जहां
संशयों की छिपकलियों पर सवार
झिंगुरों की भाषा में बतियाते
सत्‍ता के भूखे भेडिए
मनुष्‍यता को मिटाने पर तुले हैं
और
सीलन भरी अंधेरी कोठरियों में बन्‍द
ठंडी आग पीता हुआ
आम आदमी
अपनी पहचान से कटा
सूर्य की तलाश में
भटक रहा है
युग-युगों से
इस काले जंगल में।

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Thursday, May 17, 2012

क्‍लर्क

चश्‍मे के भीतर से
घूरती
घाघ क्‍लर्की आंखे
आगन्‍तुकों को
आतंकित कर
व्‍यर्थ-सी
मशगूल हो गई
सामने स्‍वेटर के फंदे बरती
टाइपिस्‍ट पर
और काली मजदूरिन की
सपाट-सूखी छाती सी
टेबिल पर गोलाई की मुद्रा में
अंगुलियां
नचाते हुए
लावारिस नाजायज औलाद सी
फाईल
एक ओर सरका
एक प्रश्‍न चिन्‍हीं दृष्टि
फैंक
हांक लगाई-
’’धनीराम! पेपरवेट’’
आगन्‍तुक ने
होंठों पर
मिमियाती हंसी लाते हुए
द्वार पर बीडी फूंकते
धनीराम के हाथ पर हाथ रखा
फिर-
’’हाँ, बाबूजी पेपरवेट’’
कहते हुए
चुम्‍बकीय गति से
धनीराम
फाईल उठा
साहब के कमरे में घुस गया।
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Tuesday, May 15, 2012

बाबू


यह बाबू आफीस का
दुर्बल दीन-हीन
भाग्‍य-नोट
लिखा विधाता ने
जिसका फीकी स्‍याही से
अस्‍पष्‍ट-सा
पढ-लिखकर कर
जब से होश संभाला
इसने जीवन बेच दिया है,
इसका जीवन सरकारी है,
दस बजे से पांच बजाता है,
अनचाहा बोझ लिए
स्‍वयं से गुम होकर
घर जाता है,
यह बाबू आफीस का
दुर्बल दीन-हीन
इसके टिप्‍पण पर योजनाओं की नीव टिकी,
कुशाग्र-बुद्धि
जिसकी
साहबों की ऊसर बुद्धि को सींचती,
फिर भी बेचारा
सहता है
झिडकी काले साहब की
जो रोब दिखाते
बिना बात की बिल्‍ली से घुर्राते।
छटनी करने का डर दिखलाते है,
यह विष का घूंट पिए जाता
सब कुछ सह लेता
बेचारा
बेकारी से भयभीत हुआ
हर माह कर्ज से दबा हुआ
जीवन का रिक्‍शा खींच रहा
जिसमें बैठा सारा कुनबा
बीवी-बच्‍चे,
आधे-नंगे, आधे भूखे
 यह बाबू आफीस का
दुर्बल दीन-हीन।

Monday, May 14, 2012

मैं नहीं जानता, मैं क्‍या बोलता हूँ ?

मैं नहीं जानता
मैं क्‍या बोलता हूँ ?
एक ही के प्रति
मेरे हो जाते हैं
दो अभिमत
झुठला देता हूँ
स्‍वयं की लिखी इबारत
हर बोध को
स्‍वार्थ की तुलना में तोलता हूँ।
मैं नहीं जानता
मैं क्‍या बोलता हूँ ?

जो पहले थी भली
वहीं फिर हो जाती है बुरी
देता हूँ गालियां
मेरी कोई नहीं होती धुरी
टिकने को स्‍वयं के ‘स्‍व’ को-
कुण्‍ठाओं की
कुल्‍हाडी से छीलता हूँ
मैं नहीं जानता
मैं क्‍या बोलता हूँ ?

मेरा बडप्‍पन
हो जाता है बौना
अहम की तपती दुपहरी में
झुलस कर सूखा दौना
जिसमं शंका के छेद से
रिस जाता है सारा विश्‍वास
यों विवेकहीन अन्‍धेरे में
खालीपन को खंगालता हूँ
मैं नहीं जानता
मैं क्‍या बोलता हूँ ?
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Saturday, May 12, 2012

भीड


खुली भीड
बन्‍द भीड
अनियंत्रित भीड
नारों और जयकारों की भीड
देखते हैं हम सब
अधिक सभ्‍य हो गए हैं
और बर्बरता
नए बोध का काला चश्‍मा लगा
घुल गई
चुस्‍त बहुरंगी सभ्‍यता में।
नए आयाम
नए प्रतीक
नये बोध
अत्‍याधुनिक युग का आविर्भाव
नील-नीलान्‍त अन्‍तरिक्ष की
खुलती सीढियां
मगर
ऊपर से नीचे को उतरता है
एक प्रश्‍न चिन्‍ह ?
उपलब्ध्यिों की अश्रुत गोद में
महा-अभाव के महा-शून्‍य में
आणविक – प्रक्षेपास्‍त्रों से
भयभीत
विष्‍मताओं की घाटियों में
गूंजता
पूछ रहा है अपनी ही आवाज में
कि नये आयाम पर
क्‍या पाया ?

प्रिय पाठकों का आभार

प्रिय पाठकों,
यहां पर मेरे पिता द्वारा लिखित ''अशीर्ष कविताएं-1984'' में प्रकाशित संग्रह में संग्रहित कविताएं हैं, जिनका शीर्षक नहीं है। इस संग्रह की सभी कविताएं बिना शीर्षक हैं।  इनके संग्रह में मृत पडी कविताओं को बरसों बाद यहां मेरे द्वारा शीर्षक देकर  पुन: जीवन प्रदान करने का प्रयास किया है। ताकि आपको कविता पढने में आसानी हो।

मुझे आशा है कि आपको यह मेरा प्रयास पसन्‍द होगा।

-- संजय सिंह जादौन