Saturday, October 13, 2012
Friday, October 12, 2012
भेड़ की नियति
भेड़ें
मरुस्थल/रेत
की/भूख/प्यास
पीठ पर/लादे
कांधे पर लाठी धरे
हांकते
गढ़रिए के डर्र-डर्र
इशारों पर
पठारों/कंकरीले
मैदानों के पार
नपीची गरदनें किए
सूंघती/घास/पानी की
गंध को
चलती जाती है
रेवड़-दर-रेवड़
गरदनें झुकाए
धरती की नमकीनआग
चाटते
डंठलों को चबाते
जितने दूर चले जाते
हैं
उतनी ही दूर हाती
जाती है
उनसे
पानी/हरी घास की
तलाश
उनके मिमियाने/आपस
में सींग उलझाने से
कोई फर्क नहीं पड़ता
गड़रिए को
वह
किसी नेता की तरह
माईक पर ध्यान
आकर्षित करने की
मुद्रा में
लाठी की ठक्-ठक् कर
हांक लगा
भेड़ों को
बबूल की/गंजी छांव
तले
इकट्ठा कर लेता है
अपनी
भूख/प्यास के लिए
दुहाता है
दूध/भेड़ों का
बेच लेता है कसाई को
भेड़े
गड़रिए को
पीठ पर लदी/पोटली
पानी की छागल से
रोटी खाते/पानी पीते
ठंडी नज़रों
से/टुकर-टुकर देखती है
और
चुपचाप/अपनी नियति
पर
गरदनें लटकाए
जुकाली करती रहती है
कि
भेड़ पर कोई नहीं
छोड़ता
ऊन।
Thursday, October 11, 2012
माटी का संगीत
खेतों-खलिहानों में
कड़ी धूप में
स्वेद बह रहा,
समता की पट्टी पर
मेहनत की कलमों से
लिखी जा रही
श्रम की गीता।
जन-जीवन की खुशहाली
फिर उतर रही
ले नई योजना
जीवन के
उजले यथार्थ पर।
और कहीं पर
सत्यका मोहन
वेणु लेर
मेड़ों पर गा रहा
गीत फसल के,
जिनको सुनकर
नाच रही
फसलों की राधा।
बासन्ती परिधान
पहनकर
मलयज बजा रहा है
ताली
माटी का
संगीत नया है।
Wednesday, October 10, 2012
बीते सावन की यादें
गर्मी से झुलसे
वन-पर्वत हुलसे
जल की लिए छागल
पहाड़ी के पार जो
दिखा बादल।
ग्रीष्म से तपते
द्रुम-लता
पात-पात का कर चुम्बन,
सूत कातती
तकली-सी नाचती बदली
लायी प्रणय का
निमंत्रण;
आया आषाढ़
नहाया पहाड़
भीज गया भीतर-बाहर
छुमकी जो बूंदी की
पायल।
अकेले में
बिजली की देह
Tuesday, October 9, 2012
श्रम संवलाई मजूरन
बासन्ती
बयार की सरगम पर
नृत्य करती
पीली सरसों
शिशिर की
ओस-बूंदों का आसव पी
जवान होती
गेहूं की बालियों का
लहलाहता
दर्प।
यह सब
देखती है
खुली आंखों
सच होता
भोर के स्वप्न-सा
पाणत करती
श्रम-संवलाई मजूरन;
उसके कोकिल-कंठी
हलवाहे हर्ष-गीत
बुनते हैं
उसका
वर्तमान
भविष्य की तुलना में
Monday, October 8, 2012
मेरे बच्चों !
आज
जब हाथ को हाथ नहीं
सुहाता
उजालों पर कर रहे
हैं
अंधेरे
प्रहार पर प्रहार
योजनाबद्ध सलीके से
सूरज, चांद-सितारों,
परियों के सपनों से
रिक्त किया जा रहा
है।
तुम्हारा
आकश
और
डूबते जा रहे हो
कहीं दूर
गहरे और गहरे में
जैसे
कोई अवरूद्ध कर रहा
हो
मां के मधुर कंठ को,
मेरे बच्चों !
मां की लोरी से बढ़
कर
कोई आशीर्वाद नहीं
मां से बढ़ कर
कोई देव प्रतिमा
नहीं
कोई मजहब नहीं
तुम्हें
उन्मत्त प्रभंजन
के होंठ चूम
अन्धकार को वल्लरी
पर
अंकुरित हो खिलना है
सूर्य फूल-सा।
----
Subscribe to:
Posts (Atom)

.jpg)




