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Thursday, July 19, 2012

स्‍वर लहरी




इन्‍ही श्‍वास उर्मियों में उछलते गिरते प्रतिक्ष,
इन्‍ही घनों में स्‍वप्‍न शून्‍य-सा रोता चातक मन,
इन्‍हीं खगों-सी मुक्‍त कल्‍पना में कवि की स्‍वर-नहरी
कर देती मस्‍त इन्‍हीं लताओं-सी पुलकित तन-मन।

मेरे जीवन में संचित है उत्‍थानप-तन,
मेरे मानस-पट पर अंकित हास-रुदन ।।

घोर तमिस्‍त्रा में तारों के मणि-दीपक मुस्‍काते,
दूर कहीं बांसों के वन में बंसी के स्‍वर गाते,
जल उठती ज्‍वाला बुझती सहसा, अश्रु बरस जाते,
तो वर देते कवि के गीत अधर पर अकुलाते।

मेरे कर में बंधा सृष्टि का प्रजल-सृजन,
स्‍वर में बंधी जागरण की अभिनव गर्जन।।

मेरे कदमों की आहट पर पर्वत शीष झुकाते,
मैं नि:शंक बढ़ा चलता निज पथ पर हंसते-गाते,
बुद्बुद् मेरे मन के मीत, नहीं मेरे तो गीत
सागर की लहरों पर अम्‍बर पर मचल लहराते।।

मेरे स्‍वर में गूंज रही नवयुग की जागृत धड़कन।
मेरे साहस में अंगड़ाई लेता जन-जन का मन।।
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Wednesday, July 18, 2012

मेरे अमिट विश्‍वास हो


कंटकित हो मुस्‍कुराती नवल सुमनार्चित प्रशाखा,
हृदय उपवन में प्रफुल्लित वेदना के हास हो।

प्रगति प्रांगण में तुम्‍हीं,
मेरे अमिट विश्‍वास हो ।

मधुर अधरों पर सुशोभित मौन मन की मूक भाषा,
विरल भावों के श्रृंगारित दिवित आकाश हो।
चन्‍द्रबाला-सी उमर नीलाम्‍बरा मुकुलित कलेवर,
उर गगन में छिटक बरसाते सुधार विद्यु-हास हो।

प्रगति प्रांगण में तुम्‍हीं,
मेरे अमिट विश्‍वास हो।

मुक्‍त नभ की एक खगमाला, दिवंगत नीड़ हो तुम,
मंदिर छाया में प्रणय के गीतिमय नि:श्‍वास हो।
तुम नवोदित सुमन, मैं गुनगुन-गुनन्‍ की मधुर पुकार,
विश्‍व-वीणा पर निनादित स्‍वरित स्‍वप्‍नाकाश हो।

प्रगति प्रांगण में तुम्‍हीं,
मेरे अमिट विश्‍वास हो।
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Tuesday, July 17, 2012

बर्फ की जमी नदी



बन्‍धु रे !
हमारे लोकतंत्र में
उपलब्धियों के नाम पर
फूल नहीं खिलते
केवल कुछ एक
घटनाएं उगती है।
भय में जीते हैं लोग
चुटकी भर खुशी के लिए 
भेदने होते हैं
कितने ही व्‍यूह।

हमारे रहनुमा
कर रहे हैं कुकुरमुत्‍तों की खेती
वर्णशंकर बिरादरी प्रसूत रही है
जात से कुजात,

गांवों की फसलों का
अर्थशास्‍त्र
उलटा पढ़ा जा रहा है शहरों में
और सचमुच
’होरी’ आज भी
तरसता है
मुट्ठी भर भात को।

बन्‍धु  !
कुछ सोच तो सही
क्रांति की बात
क्‍या तेरे-मेरे भीतर
ठंडी बर्फ की जमी नदी है।
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Monday, July 16, 2012

असफल तलाश




एक के बाद एक
अनगिन
अंधेरी सुरंगों में
नहीं देता है दिखाई

खौफ से
कहीं छुपा है सूर्य भी,
अंधेरे की चोट पर चोट
सहते-सहते
सुन्‍न हो गए है मस्तिष्‍क,
चुकता जा रहा है
जुझारू सामर्थ।
यहां हर रीड़ की हड्डी
कमान हुई जा रही है
या लिजलिजे केंचुए की तरह
सुरंगों के उस पार
रोशनी की
असफल तलाश में
रैंग रहे हैं
हम।

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