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Tuesday, July 3, 2012

गणतंत्र दिवस

हां
26 जनवरी
गणतंत्र दिवस
शहीदों के रक्‍त से लिखा इतिहास
कोटि-कोटि जन-जन का उल्‍लास
एक आजम है खुशी का चारों ओर;
मगर
मजदूरी के अवकाश से
बिना मजूरी के
एक जर्जरित माँ
बीतते माघ की सर्दी से ठिठु‍रती
खुद भूख को दफन कर
नीचे खुले आकाश के
ईंटों के चूल्‍हे के पास बैठ
चापड़ की रोटी खिला
निर्वसन-बच्‍चों की धंसी-धंसी आंखों में
आसमानी परियों की कहानियां उंढेलती है
आने वाले कल की
नई संभावनाओं की स्थिति की
एक पीढ़ा को भोगकर
एक पीढ़ा को प्रसवती है।
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Monday, July 2, 2012

कटे आदमियों के ढेर


हम पीढ़ी-दर पीढ़ी
विरासत में प्राप्‍त
नपुंसक भाग्‍य के नाम पर
जीने के अभ्‍यस्‍त,
जिनको नहीं होती कोई
हरारत
किसी के साथ जीने की
लिपटने की।
हम कटे आदमियों के ढेर
दृष्टि-विहीन,
आस्‍थाहीन,
डूबी-डूबी आवाजे
घिघियाते
लुटी अस्मिता के
हारे हुए कबंध-लोग
अस्थिपंजर मात्र
टूटे कंधों पर
खिचियाये विक्रम को ढोते-ढोते
पस्‍त होकर
समर्पित कर देते हैं
अपनी समग्र उपलब्धियों की देह

लम्‍बी चोंच से नुचवाने

खूंखार पंजों वाले

गिद्दों को।

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Sunday, July 1, 2012

मूर्तिकार


मैने मेरे बच्‍चों को
वह
समझ- सोच को
सुसंस्‍कृत कला दो
कि
शब्‍दों को
छैनी की भांति
इतना
पैना करो
कि
संस्‍कारगत रूढ़ियों की
परतों को
खूरच डालें।
छैनी के
तीखेपन में
उस कुशल मूर्तिकार की
समझ-सोच हो
कि
मन खरोंच न पड़े,
रूपविधान,
अंतर्वस्‍तु
सभी शालीन संस्‍कार
उनकी भाषा को दिए
नहीं दिया
तो सिर्फ
उन्‍हें
दोगली भाषा का ज्ञान
जिसके
अभाव में
वो
अभिमन्‍यु की तरह
घिर गए
कौरवी चक्रव्‍यूह में।
किन्‍तु
उम्र बढ़ने के साथ-साथ
आज बच्‍चे सीख गए
कि
मेरी सारी समझ-सोच
हो चुकी है
बुजुर्वा
और
वक्‍त ने उन्‍हें
बना दिया है
मूर्ति-भंजक।


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Thursday, June 28, 2012

लेटर बॉक्‍स


दुनियाँ
एक लेटर बॉक्‍स है
जिसमें
हम सब
पोस्‍ट कार्ड से नंगे
जिनका
कुछ भी नहीं गोपनीय
स्‍वत:
कर देते हैं प्रचारित
मन के भेद।
कोई
रंग-बिरंगे सजे-संवरे
मौन-निमंत्रण-से,
किडनेप कर लिए जाते हैं
जो रास्‍ते में
गन्‍तव्‍य से पहिले
और----कुछ
गलत पते के पत्र-से
भटकते रहते हैं यहां-वहां
और
अन्‍त में डाल दिए जाते हैं
डैड-लेटर्स में।
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Friday, June 22, 2012

हाड़ का मर्द

छा गया है
जिन्‍दगी के सम्‍पूर्ण
केनवास पर
दर्द
जैसे बन्‍द कमरे की
तस्‍वीरों पर चढ़ी हो
गर्द
और हटाते-हटाते
मलबे में
जिसके दब गया है
हाड़ का मर्द।
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Thursday, June 21, 2012

टीनापोल

दूर-दूर तक

गन्‍दलाई रेत पर

रंगराई पहाड़ी पर

कहीं बिछादी गई

कहीं पेड़ों की टहनियों से बंधी

सूखी रह

टीनापोल से धुली

चांदनी।

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Wednesday, June 20, 2012

अरूणाई

अरुणाई -उषा को
चारू मुस्‍कान के साथ
आंगन में उतरे
रश्मि-विहंग।
मेरे कमरे की खुली
खिड़की से आकर
दीवार पर लगे दर्पण में
अपने ही प्रतिबिम्‍ब से
चोंच लड़ाने लगी
चिड़ि‍या।
पड़ौस की
दो पड़ौसिने
आपस में लगी उछालने
मन की कुण्‍ठाओं की
बासी-बुसी खिचड़ी !
ईश्‍वर !
यह कैसा दिन उगा?
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