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Wednesday, May 30, 2012

सम्‍बन्‍ध

हो गए
छोटे और छोटे
संबंधों के घेरे।
कजलाये हैं स्‍नेह के क्षितिज
धुंआती-सी दीवार
बीच दर्पण
और बिम्‍बों के
आकृतिहीन आकार।
झपट ले गए रोशनी को
गुनाह के अंधेरेा
शब्‍द पर प्‍लास्टिकी चेहरे
कैक्‍टसी-कुटिल
अर्थ,
नयी कविता के
नाम पर ज्‍यों भाषायी ज्ञान
व्‍यर्थ ।
छन्‍द, लय, गति
हुई घटनाएं
ज्‍यों बीते सेवेरे ।
मिलकर छूट जाते
स्‍टेशन तक
रेल यात्रा के
मित्र
हम बीथिकाओं में
प्रदर्शित
रंग-रूप-रसहीन
चित्र।
इतना है विषाक्‍त आदमी
डरते हैं सपेरे।

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Tuesday, May 29, 2012

मतदाता, राजनीति, चुनाव और वोट

1.
­बल्‍ब की
पाण्‍डु
रोशनी को
चर लिया
कांच के रंग-महल की
मरक्राइज्‍ड गाय ने।
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2.
राजनीति
एक टुकडा पान का
थोडा-सा
सफेद चूना
शांति सूचक,
लाल-कत्‍था
बलिदान का सूचक
थूक दिया जाता है
शौचालयों में यहां-वहां,
रह जाते हैं
सिर्फ
मूंह में
सुपारी के टुकडे
दाँत बजाने के लिए।
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3.
सुबह आफीस जाते
खरीदी.......
और
शाम को लौटते
फैंक दी गई.......
खाली माचिस की
डिबिया
यह है मतदाता।
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4.
भारत की आत्‍मा है
ये गाँव
जातिवाद के विषधर से दंशित
जी रहे लिए
जहरीला तनाव
और भी ज्‍यादा उगल जाते हैं
जहर
ये चुनाव।
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5.
यह सोचना
व्‍यर्थ्‍ हो गया कि अब फिर
मेरा 'वोट'
अपना मुखडा नहीं बदल लेगा ........?
क्‍योंकि इसके
आचरण का पीताम्‍बर
तार-तार हो चुका है।
सत्‍ता के भूखे
कौरवों की सभा में
द्रौपदी के शल को बचने में असफल
स्‍वयं दु:शासन के हाथों
निवर्सन हो गया
और भयाक्रांत द्रौपदी
शंकित है।
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Monday, May 28, 2012

अशीर्षक

1.
इच्‍छाएं........?

जिसका कोई गणित नहीं

रोटी........?

भू-गोल

सहज-सुलभ

सिर्फ

नेताई बोल।

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2.
इन्‍सान को तलाशूं कहां

किन-किन मुखडों में

आदमी यहां

बंट गया

कई-कई टुकडों में।

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3.
लापता सूरज के

शहर में

जिन्‍दगी जीना........?

मात्र

क्‍लोरीनेटिड जल पीना।

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4.
कैसी भोर ........?

फिर जगा शोर

गाड गया रोम-रोम में

आलपिन

यह किरणें वाला

दिन।

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5.
नेता वही

जो अपनी कही बात

नकार दे

हर झूठ को

सच्‍च बना

प्रचार दे।

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भूल सुधार


हाय! मौका दिए बगैर

भूल सुधार का

लो, चले गए वर्ष।

हौसलों और तमन्‍नाओं का

दौडता था

नया खून रगों में

मुटि़ठयों में थे

फौलादी इरादे

विश्‍वास

परादर्शी दृगों में।

छिटक कर

टूट गए

आंखों के उत्‍कर्ष।

मिट़टी को उपजाऊ बनाने की

उम्‍मीद में

खुशहा फसल के

खाद बन गए

अनेक संकल्पों के सूर्य

देखते स्‍वप्‍न

सुनहरे कल के।

मगर, हाय!

अंकुर क्रांति के नहीं

उगा तो नागफनी अमर्ष।

फहरानी तो थी कीर्ति-पताकाएं

हर मील पर

गाड दिए खंजर

चीर गए सरे आम शील को

टीनापोली आचरण

बांच रहे गीता की जगह

सत्‍य कथा बालचर।

विद्यालय ...........?

अंधा कुंआ,

एक हांपता संघर्ष।

समय की रेत पर

छूटते पद-चिन्‍ह

फडफडाती ये तारीखें।

भूत की अनंत खोह में

अन्‍याय गूंगी घटनाओं-सी

दफन हो गईं

वर्तमान इतिहास की चीखें।

आखिर कब तक

करते रहेंगे

विचार विमर्श।

सौतेले बेटे-से

गांव पर

मंडराती चीलें

खजूर सी योजनाओं के

बौने विकास के

पांवों के नीचे

सूखी झीलें।

झंझावत

और

कागजी नाव के

संज्ञा-हीन निष्‍कर्ष।
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Wednesday, May 23, 2012


1.
अज्ञानी का
तर्क
शून्‍य पात्र में
जल भरते ही
भक्‍क-भक्‍क ।
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2.
योजनाएं........ ? ........... ?
कागजों के स्‍टेडियम में
भूखे आंकडों की
अन्‍धी घुड-दौड।
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3.
मुर्दा पीढियों के
नाम-ज्‍यों
एकत्र हो गए
घर में
डालडा के
संज्ञाहीन
खाली टिन।
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आश्‍वासन

तुम्‍हारे आश्‍वासन की
अंगुली पकडे
नन्‍हें बालक-सी
प्रफुलता लिए
ठुमुकता फिरता था मैं
पूरे माहौल में
चर्चा थी
बसंती हवा के आने की,
अहसास से
धडक उठता था
पत्‍तों का हृदय,
फूल बनने की अभिलाषा में
उमंग रहीं थीं कलियां
मन की कोकिला
कूकती फिरती थी
डाल-डाल
उमंग के सिवा कुछ भी तो गम न था।
तुम्‍हारी-
बेहद आत्‍मीयता के अससास से
मेरे छोटे-छोटे पांव
बढते-से लग रहे थे
एक गति-सी महसूसता था मैं
लगता था, जैसे मैं
तुम्‍हारे घुटनों से लगकर
कमर, कान और फिर कान के ऊपर
यानी तुम्‍हारे बराबर
होता जा रहा था मैं।
मेरा हर दर्द
तुम्‍हारा दर्द था ना......?
मेरी उदासी
तुम्‍हारे चेपर स्‍याह-सी
घिर आती थी......?
मेरे टूटने मात्र के खौफ से
तुम
सूखे पत्‍ते-से कांप जाते थे ना..... ?
मगर उस दिन
तुम्‍हारे
भीड में अंगुली छोड दिए जाने पर
अबोला बालक
मैं---
दहशत का मारा
दिशाहीन-सा
टूटे विश्‍वास की मुटि़ठयों में
बन्‍द किए
अपने आत्‍म-विश्‍वास की पराजय पर
स्‍तब्‍ध-सा
आंखों के खारेपन को उलीचता रहा
और तुमने----
मुझे तलाशने की भूल नहीं कीा
इस तरह छूट जाना भी
कितना निर्मम होता है ?
हटा भी तो नहीं पाता
मन के दरवाजे पर लगी
तुम्‍हारे नेह की नेम-प्‍लेट,
आज भी---
नहीं लगता
कि यह सही हुआ है,
लगता है
कहीं गलत हवा
घुसपैठिये-सी
विचार-यंत्र की तोड गई है
इसलिए
मस्तिष्‍क के रेडार पर
मेरी मासूमियत का चित्र
नहीं उभर पाता है।
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Tuesday, May 22, 2012

अशीर्षक

1.
गंदलाए बौरे पर्वत के
नंगे पावों के नीचे
लेट गई
सभ्‍यता
छोडकर आकाश की ऊँचाइयां
निर्ससना
कामिनी।
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2.

औरत........
उजलायी सुन्‍दर-सी
एस्‍ट्रे में
यौन की जलती
सिगरेट।
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