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Sunday, October 7, 2012

फटी बिवाई की पीर



आज भी
बहुत कुछ
अनकहा सा बांचता हूं
तुम्‍हारे नयन में
जब मैं झांकता हूं।
चुक कए क्‍या
सचमुच वो सभी सन्‍दर्भ
सब संवेग
जो हमने साथ जिए थे?
माना कि धुंधला गए
हथेलियों पर खिले
मेहंदी के फूल
बीते कल पर
अब आंसू बहाना है फिजूल।
टीसती तुम्‍हारे
पांव की फटी बिवाई की
अनकही पीर
मैं जानता हूं।
टूट कर बिखरते नहीं
आदमी जीवट वाले
जूझते है नियति से
सुख दु:ख के हर फासले को
नापते हैं पांव की गति से
धुंध में डूबा
दर्द का हर गांव मैं
पहचानता हूं।
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Saturday, October 6, 2012

नए सूर्य की प्रतिक्षा में......


उसने
रक्‍त–मज्‍जा से चिन कर
मेरे भुवन को
अपनी श्‍वांसों के कर्पूर से
सुवासित कर
स्‍वयं गन्‍धहीन हो गया।
मेरे
जीवन का अंधकार पी
अपनी सहज-सरल मुस्‍कानों की पूर्णिमा दे
उसने अमावस्‍या का वरण किया।
उसने खूद को मथ कर
मुझे गेहूं की बालियों सी
छन्‍दमयी कविता दे
स्‍वयं छन्‍दहीन हो गया।
अपने अलगोजे के स्‍वर
मेरी बांसुरी को दे
स्‍वयं बेसुरा हो गया।
मैने
उसने पसीने के समुद्र का मंथन कर
उसकी लक्ष्‍मी का हरण कर
'विष्‍णु' पद प्राप्‍त कर लिया।
वह लक्ष्‍मीहीन
फटेहाल-काला-कलूटा
अस्थियों का ढांचा भर
गड्ढे में धंसी-धंसी
उनींदी आंखों से बुझे सपनों को ले
कल उगने वाले
नए एूर्य की प्रतीक्षा में
जी रहा है।
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Friday, October 5, 2012

मुट्ठी भर छांव



सुनो!
पतेल की टूटी छान वाले
गंवईया,
ये रेतीले टीले
तुम्‍हारी
पैबन्‍द लगी
अस्मिता से कह रहे हैं-
तुम
शहरों को तो बांटते हो
श्रम के मोती, 
अपनी 
पसीने की गंध से
रेत का
बांझपन
हरा करने को
बो दो
मुट्ठी भर छांव।

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Thursday, October 4, 2012

कविता




खेत
हांकने से पहले
हल के
लोहे को
दहकती आग की भट्टी
लुहारन के हथौड़े की
चोट से गुजरना होता है
फिर
पानीदार
हल
जमीन जोत पाता है,
खेत में
फसल लहलहाने से पहले
किसान के भीतर
उगता है
बीज/उसका भविष्‍य
फूलता है, फलता है
पसीना,
अनुभूति
शब्‍दों के शिकंजे से मुक्‍त हो
सन्‍नाटे के विरुद्ध
नाद की गूंज तोड़
आदमी के स्‍वप्‍न
भविष्‍य के संस्‍कार गढ़ने को

अभिव्‍यक्‍त होती है कविता में।

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