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Tuesday, September 18, 2012

साजिस



ये
जो चीख-चीख कर
धरती से आकाश तक
उछाल रहे हैं
थोथे शब्‍द
यह इनके भीतर की घिन्‍न है
और कुछ नहीं
एक पेट की दूसरे पेट से,
एक आंख की दूसरी आंख से,
साजिश भर है
सूजती आंखों की
मन की आंखों को
अंधा करने की;
अरअसल
ये महंत
एक को अनेक में बांट कर
तुझे-मुझे
बरगला कर
देश के नक्‍शे को
काट कर आरियों से
छीन लेना चाहते हैं
हमारा आजादी का
आकाश।
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Monday, September 17, 2012

हथेलियों पर आकाश



मेरे बुढि़याते
पांवों के नीचे से
छूटती जा रही है सतह।
अब संभव नहीं
स्थिर पांव खड़े होकर
आकाश को थाम लेना,
नस-नस को चीरता
नाखूनों तक
उतर गया है
एक अबोली
पीड़ा का नीला जहर
मेरी लुजलुजी देह के
मोह में
व्‍यर्थ है
भीगी आंखों से
उलीच कर
प्रश्‍न-चिन्‍ह खड़े करना,
क्‍यों खड़े करते हो तुम
प्रश्‍न चिन्‍ह.......?
कोई उत्‍तर नहीं
इस डूबते सूरज के पास
उठो, मेरे बच्‍चों !
मकड़ी के जाले से बाहर आओ,
तुम्‍हीं को अब अपने हाथ की रेखाएं गहरानी है
पसीने की दुर्गन्‍ध को भभकाना है
और फिर हथेलियों पर
आकाश उठाना है ।
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Sunday, September 16, 2012

राजस्‍वला-सन्धियां


बन्‍धु रे,
कोई वजूद नहीं
आदमी और आदमी के खून का,
यहां हर सुबह
अपने ही रक्‍त से सना
''पेड''
फैंक दिया जाता है
बेझिझक सरेआम अछूत की तरह
सड़क पर
रजस्‍वला स्‍त्री के हाथों।
ऐसे ही किसी शातिर द्वारा
भीड़ भरी सड़क पर
घोंपा जा कर छुरा/कर दिया जाता है
आदमी का खून-
हमारे भीतर कोई सिरहन पैदा नहीं करता,
हम अनजान डर से
अन्‍धे, गूंगे-बहरे हो
दुबक जाते हैं/दड़बों के द्वारा-खिड़कियां बन्‍द कर
और अन्‍धा शासन/पुलिस
समाचार पत्रों में विज्ञप्तियां जारी कर
या फिर सड़क चलते
किसी विकलांग आदमी को पकड़
झूठे को सच्‍चा बना
सन्धि करता है
रजस्‍वला सन्धियों से।
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Saturday, September 15, 2012

बूढ़ा मोह


व्‍यर्थ,
मेरा
उपेक्षित बूढ़ा मोह
रिश्‍तों की
मृग तृष्‍णा के पीछे
दूर तक
पसरे
तपते रेगिस्‍तान में
नंगे पांव
प्‍यासे कंठ
भाग रहा
तलाश्‍ता
अपनापन।
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Friday, September 14, 2012

रिसता हुआ घट

मेरे पंखों में शक्ति थी
यौवन की उमंग थी
मैंने तब
तिनका-तिनका जोड़
बनाया था घोंसला
घोंसले की
एक धरियानी थी।

सुबह दफ्तर जाते
एक पुलक
द्वार तक साथ होती थी
शाम दफ्तर से लोटते
एक पुलक, ललक होती थी
अपने बच्‍चों की।

आज बच्‍चे
अपने-अपने सुख के
पर्वतों पर चले गए 
बच्‍ची उड़ गई चिडि़या की तरह  
संगिनी खो गई 
नाती-नातिन की माया में। 

और मैं अकेला, निपट अकेला 
रह गया 
बूंद-बूंद निरन्‍तर रिसता हुआ घट।

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