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Tuesday, June 5, 2012

आंचल


उषा के आंचल की
गांठ खुली
घर आंगन
छत पर
भीतर बाहर
पथ पर
श्‍वेत-श्‍वेत किरणों की
ज्‍वार रुली
जगी भीड़
नगर-ग्राम
धूप से फैले
अनेक काम
बर्फ सी जमी राज
पिघली ।
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Monday, June 4, 2012

बंसी धुन

टूट गए
किरणों के गोफन
सूरज का ग्‍वाला
ले गया घेरे
चरागाहों से
धूप की भेड़ें
लौट रहे
जंगलों से गौधन।
उंढ़ेल गया रंग
नभ के दर्पण पे
घिर गई उदासी
राधा के मन पे
छेड़ रहे
बंसी-धुन मोहन।

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Saturday, June 2, 2012

नेता जी


नेता जी !
देशहित......... ?
''अपवाद''
नेता !
समाजवाद........ ?
''गरम कोट

सर्दी आई पहन लिया

गर्मी आई उतार दिया।''

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Friday, June 1, 2012

अधूरा स्‍वप्‍न

हम अँधेरों में
टटोलते थे
सूरज
उगने के साथ
टूट गया
एक अधूरा स्‍वप्‍न
जगे तो
चाय के साथ
पी लिया
झूठ
औढ़ लिया
स्‍वार्थ की चादर को
जतन से
आंखों पर पहल लिया
सुनहरी फ्रेम वाला
भ्रम का काला चश्‍मा
चुनने तो थे मोती
बीनने लगे
घोंघे
सागर पर उगना था बनकर सेतु
होना था पार
जनगण को
डुबो दिया 
सब गलत हो गया।

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Thursday, May 31, 2012

अंधेरे चश्‍में

आंखों पर
लगा अँधेरे चश्‍में
तलाशते हैं रोशनी।
गुजरते हैं
पकड़ अंगुली गुनाह के
तंग रास्‍तों से,
करते हैं दोस्‍ती
पहन कर खद्दर
एैयाशी के गुमाश्‍तों से,
करते हैं बातें चरित्र की
मारते हैं
लड़कियों को को कुहनी।
तलाशते हैं
जन्‍म पर विषमताओं को
समाधान
भाषण में,
बन्‍द है पुस्‍तकों में
गाँधी का दर्शन
कहां है आचरण में ?
कौन पढ़े-गुने
कुर्सियों की चिन्‍ता में
जीते हैं
सुरा-मोहिनी।
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Wednesday, May 30, 2012

सम्‍बन्‍ध

हो गए
छोटे और छोटे
संबंधों के घेरे।
कजलाये हैं स्‍नेह के क्षितिज
धुंआती-सी दीवार
बीच दर्पण
और बिम्‍बों के
आकृतिहीन आकार।
झपट ले गए रोशनी को
गुनाह के अंधेरेा
शब्‍द पर प्‍लास्टिकी चेहरे
कैक्‍टसी-कुटिल
अर्थ,
नयी कविता के
नाम पर ज्‍यों भाषायी ज्ञान
व्‍यर्थ ।
छन्‍द, लय, गति
हुई घटनाएं
ज्‍यों बीते सेवेरे ।
मिलकर छूट जाते
स्‍टेशन तक
रेल यात्रा के
मित्र
हम बीथिकाओं में
प्रदर्शित
रंग-रूप-रसहीन
चित्र।
इतना है विषाक्‍त आदमी
डरते हैं सपेरे।

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Tuesday, May 29, 2012

मतदाता, राजनीति, चुनाव और वोट

1.
­बल्‍ब की
पाण्‍डु
रोशनी को
चर लिया
कांच के रंग-महल की
मरक्राइज्‍ड गाय ने।
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2.
राजनीति
एक टुकडा पान का
थोडा-सा
सफेद चूना
शांति सूचक,
लाल-कत्‍था
बलिदान का सूचक
थूक दिया जाता है
शौचालयों में यहां-वहां,
रह जाते हैं
सिर्फ
मूंह में
सुपारी के टुकडे
दाँत बजाने के लिए।
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3.
सुबह आफीस जाते
खरीदी.......
और
शाम को लौटते
फैंक दी गई.......
खाली माचिस की
डिबिया
यह है मतदाता।
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4.
भारत की आत्‍मा है
ये गाँव
जातिवाद के विषधर से दंशित
जी रहे लिए
जहरीला तनाव
और भी ज्‍यादा उगल जाते हैं
जहर
ये चुनाव।
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5.
यह सोचना
व्‍यर्थ्‍ हो गया कि अब फिर
मेरा 'वोट'
अपना मुखडा नहीं बदल लेगा ........?
क्‍योंकि इसके
आचरण का पीताम्‍बर
तार-तार हो चुका है।
सत्‍ता के भूखे
कौरवों की सभा में
द्रौपदी के शल को बचने में असफल
स्‍वयं दु:शासन के हाथों
निवर्सन हो गया
और भयाक्रांत द्रौपदी
शंकित है।
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