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Saturday, October 6, 2012

नए सूर्य की प्रतिक्षा में......


उसने
रक्‍त–मज्‍जा से चिन कर
मेरे भुवन को
अपनी श्‍वांसों के कर्पूर से
सुवासित कर
स्‍वयं गन्‍धहीन हो गया।
मेरे
जीवन का अंधकार पी
अपनी सहज-सरल मुस्‍कानों की पूर्णिमा दे
उसने अमावस्‍या का वरण किया।
उसने खूद को मथ कर
मुझे गेहूं की बालियों सी
छन्‍दमयी कविता दे
स्‍वयं छन्‍दहीन हो गया।
अपने अलगोजे के स्‍वर
मेरी बांसुरी को दे
स्‍वयं बेसुरा हो गया।
मैने
उसने पसीने के समुद्र का मंथन कर
उसकी लक्ष्‍मी का हरण कर
'विष्‍णु' पद प्राप्‍त कर लिया।
वह लक्ष्‍मीहीन
फटेहाल-काला-कलूटा
अस्थियों का ढांचा भर
गड्ढे में धंसी-धंसी
उनींदी आंखों से बुझे सपनों को ले
कल उगने वाले
नए एूर्य की प्रतीक्षा में
जी रहा है।
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Friday, October 5, 2012

मुट्ठी भर छांव



सुनो!
पतेल की टूटी छान वाले
गंवईया,
ये रेतीले टीले
तुम्‍हारी
पैबन्‍द लगी
अस्मिता से कह रहे हैं-
तुम
शहरों को तो बांटते हो
श्रम के मोती, 
अपनी 
पसीने की गंध से
रेत का
बांझपन
हरा करने को
बो दो
मुट्ठी भर छांव।

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Thursday, October 4, 2012

कविता




खेत
हांकने से पहले
हल के
लोहे को
दहकती आग की भट्टी
लुहारन के हथौड़े की
चोट से गुजरना होता है
फिर
पानीदार
हल
जमीन जोत पाता है,
खेत में
फसल लहलहाने से पहले
किसान के भीतर
उगता है
बीज/उसका भविष्‍य
फूलता है, फलता है
पसीना,
अनुभूति
शब्‍दों के शिकंजे से मुक्‍त हो
सन्‍नाटे के विरुद्ध
नाद की गूंज तोड़
आदमी के स्‍वप्‍न
भविष्‍य के संस्‍कार गढ़ने को

अभिव्‍यक्‍त होती है कविता में।

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Wednesday, October 3, 2012

सूरज का कत्‍ल


बन्‍धु रे,
तुम बहुत भोले हो,
भोले ही नहीं अनाड़ी भी हो,
तभी तो
मदारीनुमा इन शातिर लोगों की
चिकनी चुपड़ी बातों के
सम्‍मोहन से सम्‍मोहित कर
हर बार
रीढ़ की हड्डी सीधी कर
कन्‍धों से बोझ हल्‍का करने के लालच में
अपनी गाढ़े पसीने की कमाई से हाथ धो बैठते हो।

ये जो
हर चौखट पर/बस्तियों के मोड़ पर
अलाव जलाए बैठे हैं
उजाले के नाम पर
अंधेरों की फसल बोते आए हैं।

सत्‍य तो यह है कि
तुम्‍हारे दर्द में भागीदार
ये कभी रहे ही नहीं
इन्‍होंने
हर बार
मौसम के चेहरे पर
कालिख पोती है।

बन्‍धु रे,
तुझे ही
शब्‍दों के अस्‍त्र संभाले
अकेले ही
यात्रा करते रहना है
क्‍योंकि
शातिर लोगों के चक्रव्‍यूह में फंस कर
हर बार
सूरज का कत्‍ल हुआ है।
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Tuesday, October 2, 2012

गांव-चौपाल के दिन


कहां गए वे
गांव चौपाल के दिन ?

गांव-गेल
खेत-पहाड़ से गुजरती
पगडंडियां
जा मिली शहर की सड़कों से
गबदू, पांचू
लेने लगा है होड़ अब
सिनेमा के शौकीन
शहरी लड़कों से;
स्‍वास्‍थ्‍य केन्‍द्र की नर्स की देखा-देखी
क्रीम-पाउडर का शौक पाल रही है
धूल्‍या-बाबा की नातिन।
कहां गए वे
गांव-चौपाल के दिन ?

भोलू कान्‍हा
रमजान चाचा की आंखों में
पसरा हुआ है एक भयावह रेगिस्‍तान,
चूर-चूर हो गया
आपसी पुश्‍तैनी रिश्‍तों का दर्पण
खो गई अपनी पहचान;
हर पड़ौसी की दीवार पर
चिपकी है सन्‍देहों की छिपकलियां
पूरखों से चली आ रही
भाई चारे की
एक हुक्‍का-चिलम
सब अलग-अलग हो गए;
खा गई सभी सम्‍बन्‍धों के मेमने
पंचायती राजनैतिक नरभक्षी बाघिन।
कहां गए वे
गांव-चौपाल के दिन ?

भोर में
दूध-दही
बाजरे की राबड़ी का कलेवा कर
बैलों की जोड़ी ले
खेतों को जाता
सहज-सरल किसान,
कुओं पर चलते रहट के संगीत पर
पाणत करती ग्राम-बालाएं
छूट गए, दूर बहुत दूर
पांवों से
छूटती जा रही है
पुश्‍तैनी जमीन छिन-छिन।
कहां गए वे
गांव-चौपाल के दिन ?

स्‍नेहिल
नीम, बरगदी छांव,
दूध लदी
गाय, भेड़,-बकरियों के रेवड़
अलगोजे की
थिरकती लोक-धुनें
सब सूख गए
रेत की नदी की तरह
दूध-दही की नदियां;
जाने कब लौटेगी
शिरीष की गंध लिए
सपनों की बंजारिन ?
कहां गए वे
गांव-चौपाल के दिन ?
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